राजे के वफादारों को तोड़ने की ‘रणनीति’

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के वफादारों को तोड़ने के लिए आलाकमान ने अघोषित रूप से रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री राजे को हर जिले में जाकर जनता के साथ ही वहां के स्थानीय भाजपा नेताओं से सीधा संपर्क करना पड़ रहा है।

-संकट में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे,सीएम को घेरने के लिए गुर्जर आंदोलन का ऐलान!
जोधपुर। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के वफादारों को तोड़ने के लिए आलाकमान ने अघोषित रूप से रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री राजे को हर जिले में जाकर जनता के साथ ही वहां के स्थानीय भाजपा नेताओं से सीधा संपर्क करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री राजे बजट सत्र के तुरंत बाद अप्रैल के प्रथम सप्ताह से पूरे राजस्थान में ‘विकास यात्रा’ निकालना चाहती थी, लेकिन आलाकमान ने इस यात्रा के लिए हरी झंडी नहीं दी। इससे नाराज होकर राजे ने ‘जन संवाद’ के नाम पर हर जिले में जाकर लोगों से सीधे संवाद का कार्यक्रम बना लिया। इसी बीच राजस्थान भाजपा प्रदेशाध्यक्ष को लेकर फिर से आलाकमान और राजे के बीच ठन गई। लेकिन लगता है राजे इस बार अपने पार्टी आलाकमान को मनमाफिक नहीं हांक पाएंगी। पार्टी का सूबेदार कौन हो, इस पर वे लगातार अपनी हठधर्मिता दिखाती रही हैं।
सेवा विस्तार को ठुकराया
मुख्यमंत्री राजे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से प्रस्तावित सूबेदार को चुनावी साल में स्वीकार करने को तैयार नहीं। नतीजतन आलाकमान •ाी उनसे रूठा हुआ है। आलाकमान की नाराजगी हाल ही में उस वक्त साफ दिखाई दी जब राजस्थान के मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने की उनकी सिफारिश को सिरे से ठुकरा दिया और गोयल 30 अप्रैल को रिटायर हो गए। आखिर वक्त तक गोयल पर केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं आई और मजबूरी में उनकी जगह डीबी गुप्ता को मुख्य सचिव की कमान सौंपनी पड़ी। अमित शाह केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी की कमान सौंपने का मन बना चुके हैं। लेकिन वसुंधरा इसके लिए राजी नहीं। वे विरोध में लांबिंग भी कर रही हैं। आलाकमान की दुविधा यह है कि वह चुनावी साल में वसुंधरा की ‘बगावत’ की राह नहीं खोलना चाहता। पर उन्हें राह पर लाने के लिए उनकी लगातार अनदेखी की जा रही है।
अघोषित रणनीति बनाई
मुख्य सचिव के सेवा विस्तार की सिफारिश को नामंजूर करके ही नहीं बल्कि कर्नाटक चुनाव के स्टार प्रचारक की सूची में राजे को शामिल नहीं करके भी साफ संकेत दे दिए हैं। जबकि कर्नाटक में राजस्थान के मारवाड़ी मतदाताओं की बहुतायत है। अब आलाकमान ने वसुंधरा के वफादारों को तोड़ने की अघोषित रणनीति भी बनाई है। इसके लिए बाकायदा पार्टी प्रभारी वी. सतीश इस मुहिम में जोरशोर से जुटे हुए हैं ताकि वसुंधरा की राजस्थान में जमीनी हैसियत का अंदाज लगाया जा सके। सूत्रों की मानें तो कई भाजपा नेता तो साफ कह रहे हैं कि वे वसुंधरा के बजाए पार्टी का साथ देंगे। राजस्थान के पार्टी सूबेदार का फैसला आलाकमान ने कर्नाटक चुनाव तक भले ही टाल दिया हो, लेकिन कर्नाटक चुनाव के तुरंत बाद आलाकमान कोई कठोर निर्णय भी ले सकता है। इसी रणनीति के तहत राजे के वफादारों को तोड़ने की गुपचुप मुहिम चलाई जा रही है।
राजे की चुनौतियां बढ़ी
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने तो यहां तक कहा कि वसुंधरा राजे से नाराज भाजपा के एक धड़े के इशारे पर ही गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने आरक्षण को लेकर फिर से आंदोलन करने का ऐलान किया है। इससे मुख्यमंत्री राजे की मुसीबत और बढ़ गई है। कर्नल किरोरी सिंह बैंसला ने गुर्जर आंदोलन का आह्वान किया है और कहा कि 21 मई से पहले राजस्थान के विभिन्न इलाकों में सड़कों पर उतरेंगे। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए वसुंधरा सरकार के लिए इस आंदोलन से निपटना बड़ी चुनौती हो सकती है। आलाकमान की नाराजगी और गुर्जर आंदोलन के ऐलान के बाद सीएम राजे की चुनौतियां बढ़ गई है। इससे निपटने के लिए राजे ने गुर्जर नेताओं में दो फाड़ करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।