आहोर विधानसभा सीट पर हार-जीत के समीकरण तय करते हैं राजपूत वोट, अबकी बार भी नजर

आहोर विधानसभा सीट यूं तो वर्तमान में चौधरी बनाम राजपुरोहित सीट को लेकर चर्चित रहती है, लेकिन हकीकत में यहां की जीत के समीकरण राजपूत वोट तय करते हैं। इस बार भी राजपूत समाज की भाजपा के प्रति नाराजगी यह सीट कांग्रेस के खाते में डाल सकती है।
अल्लाह बख्श खान
जालोर. जालोर जिले की आहोर विधानसभा सीट यूं तो वर्तमान में चौधरी बनाम राजपुरोहित सीट को लेकर चर्चित रहती है, लेकिन हकीकत में यहां की जीत के समीकरण राजपूत वोट तय करते हैं। इस बार भी राजपूत समाज की भाजपा के प्रति नाराजगी यह सीट कांग्रेस के खाते में डाल सकती है। हालांकि राजपूत वोटों को साधने के लिए भाजपा ने जालोर जिले के प्रभारी की जिम्मेदारी बाली विधायक व ऊर्जा मंत्री पुष्पेंद्रसिंह राणावत को दे रखी है, लेकिन पार्टी की यह रणनीति शायद इस बार कारगर साबित ना हो।
दरअसल, आहोर विधानसभा सीट बनने के बाद वर्ष 1957 से अब तक हुए तेरह चुनाव में से सात बार यहां से राजपूत समाज का विधायक रहा है। यानी की तीन दशक पहले तक यह सीट राजपूत उम्मीदवार के तौर पर जीत की संजीवनी मानी जाती थी। लेकिन बदलते हालात के साथ कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों को देखते हुए चौधरी समाज के लिए यह सीट आरक्षित सी कर दी है। वहीं भाजपा ने वर्ष 1993 से लेकर अब तक सिर्फ एक बार छोड़कर राजपुरोहित को ही टिकट दिया है। कांग्रेस के साथ शुरू से राजपूत, एससी-एसटी, अल्पसंख्यक, चौधरी व ओबीसी का निर्धारित वोट बैंक रहा है। लेकिन राम मंदिर लहर के बाद अधिकांश ओबीसी वोटों का रूझान भाजपा की तरफ हो गया। इसके साथ ही भाजपा ने यहां स्थायी तौर पर राजपुरोहित को टिकट देना शुरू किया।
इसलिए राजपूतों वोट बिगाड़ते हैं समीकरण
आहोर विधानसभा सीट पर बीते तीन दशक से सामान्य व अधिकांश ओबीसी वोटों का रूझान भाजपा की तरफ रहा है। वहीं चौधरी, एससी-एसटी, राजपूत व अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस के पक्ष में रहे हैं। हालांकि राजपूत समाज को टिकट मिलना बंद होने के बाद जहां राजपूतों वोटों का भी धु्रवीकरण होने लगा है। वहीं बीते कुछ समय से मीणा व मेघवाल समाज के कुछ वोट भी भाजपा के पाले में जाने लगे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस व भाजपा की यहां पर कांटे की टक्कर रहती है। इन सबके बीच राजपूत समाज के वोटों का झुकाव जिस पार्टी की तरफ रहता है, उस पार्टी का विधायक बनना तय रहता है। हालांकि इस बार कांग्रेस के पक्ष में स्थितियां स्पष्ट रूप से बनी हुई हैं। जिसकी वजह दलित आंदोलन के बाद एससी-एसटी वर्ग का भाजपा से पूरी तरह मोह भंग होना माना जा रहा है। ऐसे में एससी-एसटी वर्ग से मिलने वाले बीस फीसदी वोटों से भी भाजपा को इस बार वंचित रहना पड़ेगा।
तेरह में से सात विधायक राजपूत समाज के
आहोर विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में अब तक तेरह में से सात विधायक राजपूत समाज से रहे हैं। जिसमें वर्ष 1957 में कांग्रेस से माधोसिंह, वर्ष 1962 में रामराज्य परिषद से छत्तरसिंह, 1967 में कांग्रेस से माधोसिंह, 1972 में कांग्रेस से समुंदर कंवर, 1977 में जनता पार्टी से गोपालसिंह, 1980 में कांग्रेस से समुंदर कंवर व 1990 में कांग्रेस से गोपालसिंह विधायक रहे हैं। जबकि 1985 में लोकदल से भगराज चौधरी, 1993 में कांग्रेस से भगराज चौधरी, 1998 में कांग्रेस से भगराज चौधरी, 2003 में भाजपा से शंकरसिंह राजपुरोहित, 2008 में कांग्रेस से भगराज चौधरी व 2013 में भाजपा से शंकरसिंह राजपुरोहित विजयी रहे। इनमें राजपूत जाति के प्रत्याशी राम राज्य परिषद व  जनता पार्टी से भी विजयी रहे हैं और यह पार्टियां सिर्फ एक बार ही यहां पर खाता खोल पाई है।
इसलिए खफा है राजपूत समाज
दरअसल, करीब तीन साल पहले आहोर विधानसभा क्षेत्र के उम्मेदपुर ग्राम पंचायत क्षेत्र के मोरूआ गांव में ओम बन्ना मंदिर को लेकर विवाद हुआ था। चूंकि उम्मेदपुर ग्राम पंचायत का सरपंच भाजपा के जिला महामंत्री का पुत्र है। सरपंच के अनुसार जिस जमीन पर मंदिर बनाया गया था, वह ग्राम पंचायत की जमीन थी। जबकि ओम बन्ना ट्रस्ट से जुड़े राजपूत समाज के लोगों के अनुसार यह जमीन मंदिर के स्वामित्व की बताई गई। इस बात को लेकर विवाद हो गया। जिसमें सरपंच गंभीर रूप से घायल हो गया था। इसको लेकर राजपूत समाज के कुछ युवाओं को करीब डेढ़-दो महीने जेल की हवा खानी पड़ी। इस पूरे मामले में विधायक की भूमिका पर राजपूत समाज की अंगुलियां उठती रही। इसके बाद आहोर उपखंड मुख्यालय पर भी ओम बन्ना मंदिर को तोडऩे से राजपूत समाज आक्रोशित हो गया। जिस जमीन पर मंदिर तोड़ा गया, उसमें विधायक की कथित तौर पर हिस्सेदारी बताई गई। इसको लेकर विधायक के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करवाया गया। फिलहाल, इस मामले की जांच सीआईडी-सीबी में चल रही है। खफा राजपूत समाज ने गत दिनों गौरव यात्रा के दौरान ना केवल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को ज्ञापन दिया, बल्कि दौरे का जायजा लेने आए भाजपा नेताओं से भी नाराजगी जाहिर करते हुए शंकरसिंह को टिकट ना देने की पैरवी की। बता दे कि गत चुनाव में राजपूत समाज के अस्सी फीसदी वोट भाजपा के पक्ष में रहे हैं।

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