आहोर विधानसभा क्षेत्र : बदलने लगा हवाओं का रुख, कांग्रेस की नींव हुई मजबूत

अल्लाह बख्श खान @ आहोर

चुनावी रण निकट आते ही हवाओं ने अपना रुख बदलना शुरू कर दिया है। बीते दो दिनों में आहोर विधानसभा क्षेत्र में जातीय समीकरणों ने एक बार फिर से पलटा खाया है। कांग्रेस की जीत की राह में अड़ंगा बने बागी व बसपा प्रत्याशी की कमजोर होती स्थिति ने जहां कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम किया है। वहीं परम्परागत वोटों के डायवर्सन ने भाजपा के लिए चिंता बढ़ा दी है। बहरहाल, भाजपा के सामने डेमेज कंट्रोल की मुश्किलें आ खड़ी हुई हैं।

दरअसल, आहोर विधानसभा सीट पर इस बार जातीय समीकरणों पर सबकी नजरें टीकी हुई है। आहोर से चार बार विधायक रह चुके पूर्व मंत्री भगराज चौधरी के पुत्र एवं कांग्रेस प्रदेश सचिव जगदीश चौधरी के बागी बनने के बाद चौधरी जाति के वोटों में बिखराव की आशंका सताने लगी थी, लेकिन चौधरी जाति का बड़ा धड़ा कांग्रेस प्रत्याशी सवाराम पटेल के पक्ष में आने के बाद वोटों की बिखराव की आशंका लगभग खत्म सी हो गई है। वहीं बसपा नेता पंकज मीणा के पक्ष में चल रही लहर पर भी अंकुश सा लगने लगा है। इसकी सबसे बड़ी वजह अनुसूचित जाति-जनजाति के नेताओं के सवाराम के पक्ष में फिल्ड में उतरने के बाद काफी हद तक डेमेज कंट्रोल करना है। कहना गलत नहीं होगा कि आहोर विधानसभा सीट पर गत चुनाव में मोदी लहर के बावजूद महज नौ हजार वोटों से हारने वाले सवाराम पटेल के लिए फिलहाल स्थितियां काफी अनुकूल है।

भाजपा के लिए मुसीबत, कांग्रेस को मिली सांसें

इस चुनाव में सबसे खास बात यह है कि चौधरी, अनुसूचित जाति एवं मुस्लिम वोटों के बिखराव की आशंका नहीं के बराबर रह गई है। वहीं भाजपा के लिए स्वर्ण व ओबीसी वोटर्स के डायवर्ट होने की चिंता उठ खड़ी हुई है। मसलन, राजपूत, रावणा राजपूत, सुथार, कुम्हार व रेबारी जैसी बड़ी जातियों में वोटों का बिखराव होने लगा है। इस जाति समुदायों से लोग खुलेआम कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार के लिए उतर गए हैं।

इसलिए कमजोर हुए जगदीश चौधरी

कांग्रेस प्रदेश सचिव जगदीश चौधरी के पिता भगराज चौधरी चार बार आहोर से विधायक रहे हैं। वहीं कांग्रेस सरकार में वे मंत्री भी रह चुके हैं। टिकट नहीं मिलने से नाराज जगदीश चौधरी ने बागी बनकर निर्दलीय के तौर पर चुनाव लडऩे का फैसला किया। हालांकि चौधरी के लोगों ने उनसे समझाइश भी की, लेकिन बात नहीं बनी। शुरुआत में जगदीश चौधरी के अच्छे खासे वोट लेने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन अचानक से समाज का बड़ा धड़ा सवाराम पटेल के पक्ष में एकजुट हो गया। जबकि अन्य जातियों में जगदीश चौधरी की पकड़ कमजोर होने से वे काफी कमजोर हो गए हैं। जो कांग्रेस प्रत्याशी के लिए काफी सुकूनदेय है।

थमने लगी बसपा प्रत्याशी की लहर

वर्ष 2003 के चुनाव से अब तक यह रिकॉर्ड रहा कि शुरुआती तौर पर बसपा प्रत्याशी के पक्ष में अच्छा खासा माहौल रहता है, लेकिन चुनाव नजदीक आने के साथ ही यह माहौल भी कम होने लगता है। वजह है कि चुनाव के दिन तक लोग चुनाव मैदान में टिके मुख्य प्रत्याशियों को ही मतदान करते हैं। वर्ष 2003 में बसपा प्रत्याशी शेरखान महज 5500 वोट ही ले पाए थे। वहीं 2008 में बसपा प्रत्याशी गणपत प्रजापत 8400 हजार एवं 2013 में बसपा प्रत्याशी मालमसिंह राजपुरोहित 2400 वोट ही ले पाए थे।

जातीय वोटों की गणित

आहोर विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा मेघवाल जाति के करीब 35 हजार वोट हैं। इसके बाद चौधरी जाति के 27-28 हजार, राजपूत समाज के 20, राजपुरोहित समाज के 15, भोमिया राजपूत समाज के 12, रावणा राजपूत समाज के 10, मीणा समाज के 15, रेबारी समाज के 17-18, प्रजापत समाज के 17, घांची समाज के 10, सरगरा समाज के 10, भील समाज के 7 हजार एवं मुसलमानों के 10 हजार वोट है।