रानीवाड़ा विधानसभा क्षेत्र : सियासत की शतरंज में ‘रतन’ का दांव भारी

रानीवाड़ा में नारायणसिंह देवल की जीत तय मान कर चल रही भाजपा के लिए कांग्रेस प्रत्याशी के दांव ने मुश्किल बढ़ा दी है। तीन बार विधायक व मंत्री रह चुके अर्जुनसिंह देवड़ा को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस ज्वाइन करवाने एवं बिश्नोई जाति के वोटों को पक्ष में करके रतन ने सियासत की शतरंज में तुरूप का पत्ता फेंका है।

अल्लाह बख्श खान @ जालोर

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जालोर में गौरव यात्रा के दौरान सुंधा माता तीर्थ पर जनसभा में जुटी भीड़ और चौधरी-बिश्नोई वोटों के धु्रवीकरण के चलते रानीवाड़ा में नारायणसिंह देवल की जीत तय मानकर चल रही भाजपा को झटका लगा है। हाल के दिनों में नाराज चल रहे बिश्नोई समुदाय के लोगों को मनाने में कामयाब होने के बाद भाजपा के दिग्गत नेता रहे अर्जुनसिंह देवड़ा को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस ज्वाइन करवाकर कांग्रेस प्रत्याशी रतन देवासी ने सारे समीकरण बदल कर रख दिए हैं। एक महीने पहले तक चल रही एकतरफा लहर में रतन देवासी के दांव ने कड़े संघर्ष के हालात बना दिए हैं।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव 2013 में रतन देवासी को कांग्रेस ने टिकट दिया, लेकिन ओबीसी व स्वर्ण जातियों के एकजुट होने के साथ ही कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक रहे एससी-एसटी व अल्पसंख्यक समुदाय के वोट भी डायवर्ट हुए। वहीं चौधरी समाज के तकरीबन संपूर्ण वोट तो बिश्नोई समाज के 70-80 फीसदी वोट नारायणसिंह देवल के पाले में रहे। इस चुनाव में रतन देवासी को 32 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस बार रतन देवासी अपने परम्परागत वोटों को एकजुट करने में कामयाब रहे, लेकिन चौधरी-बिश्नोई वोटों के ध्रुवीकरण से भाजपा इस सीट अपनी जीत तय मानकर चल रही थी। इस बीच गत दिनों ताजा घटनाक्रम में रतन देवासी बिश्नोई समाज के बड़े धड़े मनाने में कामयाब हो गए। इसके साथ ही रानीवाड़ा से तीन बार विधायक व भाजपा सरकार में केबिनेट मंत्री अर्जुनसिंह देवड़ा को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस ज्वाइन करवाकर सियासत की शतरंज ही बदलकर रख दी।

दांव पर देवड़ा-देवल-देवासी का राजनीतिक जीवन

कद्दावर नेता अर्जुनसिंह देवड़ा की अपने क्षेत्र में तगड़ी पकड़ रही है। वे तीन बार विधायक रहने के साथ ही भाजपा सरकार में मंत्री रहे हैं, लेकिन उनका टिकट बदलकर नारायणसिंह देवल को देने एवं पार्टी में उपेक्षा होने से उनका राजनीतिक कॅरियर भी डगमगाने लगा था। ऐसे में उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। लेकिन अब नारायणसिंह देवल को हराना उनके लिए मूंछ की लड़ाई हो गई है। यही वजह है कि वे खुद भी फिल्ड में सक्रिय हो गए हैं। वहीं नारायणसिंह देवल के लिए इस बार सीट को सुरक्षित रखना जरूरी हो गया। तो दूसरी तरफ गत बार हार चुके रतन देवासी के लिए हर हाल में चुनाव के नतीजे अपने पक्ष में करना जरूरी सा हो गया है।

एंटी इनकम्बेंसी व दलित वोटों की बड़ी भूमिका

राज्य की भाजपा सरकार के प्रति एंटी इनकम्बेंसी के साथ दलित आंदोलन के बाद जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर दलित समुदाय एकजुट है। सबसे खास बात यह है कि दलित समुदाय कांग्रेस या बसपा को समर्थन कर रहा है। हालांकि रानीवाड़ा में दलित समुदाय से ऐसा कोई कद्दावर नेता चुनाव में नहीं होने से दलित वोटों के सम्पूर्ण रूप से कांग्रेस में जाने की संभावना है। वहीं एंटी इनकम्बेंसी के चलते भाजपा के परम्परागत वोट बैंक में भी सेंध लग सकती है।

यह है वोटों का गणित

रानीवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में मेघवाल समाज के करीब 30 हजार वोट है, जबकि इसके बाद चौधरी समाज के 27-28 हजार, देवासी समाज के 22, बिश्नोई समाज के 15 हजार, राजपूतों के 14 हजार, भोमिया राजपूत व राजपुरोहितों के 10-12 हजार, भीलों के 12-14 हजार, कोली समाज के 5-7 हजार, मुसलमानों के 7 हजार एवं प्रजापत समाज के करीब 8 हजार वोट हैं।