कभी राहुल गांधी से मिलने को ढाई साल तक गुहार, आज आमजन से लेकर बड़े नेता भी कायल

अल्लाह बख्श खान @ जालोर
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कार्यकाल अच्छा होने के बावजूद गत विधानसभा चुनावों में कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। चुनाव से पहले जहां राजस्थान में कांग्रेस के पक्ष में माहौल दिख रहा था। वहीं अंदरखाने मोदी की सुनामी चल रही थी। नतीजे आए, कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई। तमाम दिग्गज निपट गए, करीब आधे कांग्रेस विधायक किस्मत से जीते। इन्हीं हालातों के बीच संघर्षी और साधारण नेता सुखराम 25 हजार वोटों से चुनाव जीत गए वो भी उस जगह से जहां तीनों तरफ गुजरात है और ऊपर से मोदी की ऐसी सुनामी थी कि दूर-दूर तक कांग्रेस का कोई टापू ही नहीं बचा था। सुखराम को एक लाख से ज्यादा वोट मिले, पूरे प्रदेश में वसुंधरा राजे के बाद सबसे ज्यादा। कांग्रेस में तो उनके आसपास ही कोई नहीं था, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सुखराम से 30 हजार कम वोट लेकर दूसरे स्थान पर थे। उनकी जीत को लेकर भाजपा में भी आलाकमान तक चर्चाएं चलीं। आखिर भाजपा के आला नेताओं की जुबां से भी दबी जुबां यही निकला कि यह कांग्रेस की नहीं सुखराम बिश्नोई की जीत थी। लेकिन इससे भी दिलचस्प बात यह है कि जो सुखराम बिश्नोई 2008 के विधानसभा चुनाव से पूर्व टिकट पाने के लिए ढाई साल तक राहुल गांधी से मिलने के लिए तमाम बड़े नेताओं से गुहार लगाते रहे। उसी शख्स की कार्यशैली के आज राहुल गांधी से लेकर अशोक गहलोत तक कायल है। यह वहीं सुखराम बिश्नोई है जिनकी जीत पर खुद अशोक गहलोत ने उनके गृह क्षेत्र में आकर कहा था ‘सुखराम जी यह जीत इसलिए नसीब हुई है कि आपने कभी जनता की जाजम नहीं छोड़ी।’

छात्र जीवन से राजनीति से नाता, आज जनता के हमदर्द

सांचौर विधायक सुखराम बिश्नोई कॉलेज के दिनों से ही सियासत में सक्रिय रहे हैं। कभी बेहद मुंहफट रहे, सख्त मिजाज, निहायत ही देसी, ज्यादा धन जोड़ा नहीं था। कभी “टिगट तो मिनख बस गी कोय देनी, टिगट आपांने कुंण दे” की बात करने वाले सुखराम बिश्नोई को 2008 में सांचौर विधानसभा सीट से टिकट मिल गई। बीजेपी के बागी उम्मीदवार के चलते त्रिकोणीय मुकाबले के बावजूद भी चुनाव हारे। कुछ अतिउत्साहित कार्यकर्ताओं के चलते माकूल माहौल में भी करीब 3 हजार वोट से चुनाव हार गए। नतीजे के बाद समर्थकों, सहयोगियों, परिवार के कुछ सदस्यों की आंखों में आंसू थे। होने ही थे ऐसे अवसर बार-बार नहीं मिलते, वो भी सांचौर जैसी सबसे खर्चीली विधानसभा सीट पर। वैसे भी सुखराम बिश्नोई तो चुनाव ही चंदे पर लड़े थे, लेकिन बेहद निराशाजनक माहौल में सुखराम बिश्नोई के शब्द थे “रोये उं राज थोड़ो ई मिले” यानी कि रोने से राज नहीं मिलता है।

कभी मुंहफट और सख्त, फिर जनता के लिए समर्पित

वर्ष 2008 के चुनाव में सुखराम बिश्नोई चुनाव हार गए। चुनाव के बाद राज्य और केंद्र में दोनों जगह कांग्रेस की सरकार आ गई। नेताओं से लेकर उनके गुर्गों तक के पंख लग गए। स्थानीय नेताओं ने मान लिया कि सुखराम की सियासत खत्म हो गई। लेकिन सुखराम को यह मंजूर नहीं था। वे “रोये उं राज थोड़ो ई मिले” जैसे मूल मंत्र की गांठ बांध फील्ड में कूद पड़े। अध्यापकों ने चंदा कर एक गाड़ी दे दी, सुखराम बिश्नोई ने उसके ऊपर दो स्पीकर लगवा दिए, लेकिन राह इतनी भी आसान नहीं थी। तो दूसरी तरफ उनका आत्मविश्वास और संघर्ष के लिए तैयारियां भी कम नहीं थी। बेहद सादगी, संघर्ष की पराकाष्ठा, कर्मठता, गजब की नेतृत्व क्षमता दिखाई, गांधीवादी मूल्यों को कभी नहीं छोड़ा। वो स्थानीय स्तर पर कड़ी मेहनत करने के साथ-साथ सूबे और देश की राजधानी का भी चक्कर काटते रहे, क्योंकि चाहे कोई भी पार्टी हो राजधानियों में बड़े नेताओं की परिक्रमा जरूरी होती है। इस बीच, सुखराम बिश्नोई ने जनसमर्पण के चलते अपनी अच्छी छवि कायम कर ली। अब लोगों को भी उनका अपना हमदर्द समझने लग गए।

नेताओं से ढाई साल तक गुहार, फिर हुई राहुल गांधी से मुलाकात

राजधानियों में बैठे मंत्री, नेता, उनके गुर्गे सब सत्ता के नशे में चूर। बड़े नेताओं व मंत्रियों की तो छोड़ो, इनके गुर्गों तक के खाली दर्शन मात्र के लिए घण्टों इंतजार करना पड़ जाता था। कभी कभार डांट भी खानी पड़ जाती थी कि समय लेकर नहीं आए, प्रोटोकॉल होता है। लेकिन देसी सुखराम जो राजनीति की जरूरी चीजों जैसे चापलूसी, स्तुति गायन, झूठ, झांसा से कोसों दूर थे। उन्हें भला प्रोटोकॉल जैसे बेहद नकली तामझाम से क्या लेना-देना। ऊपर से राजधानियों में चलने वाला सिस्टम, जुगाड़, सेटिंग, लाइजनिंग आदि का खतरनाक खेल। खैर समय चलता रहा, वो दो-ढाई बरसों तक पार्टी उपाध्यक्ष से मुलाकात के लिए समय लेने में लगे रहे। समय मिला, बन्द कमरे में राहुल ने तारीफ की और हौसला अफजाई भी। सुखराम ज्यादा किसी आस के बिना लगे रहे।

कभी आखिरी लिस्ट में नाम, अब सब पर भारी

इसी दरम्यान इनकी अगुवाई में सांचौर में कांग्रेस स्थानीय निकाय के चुनाव जीत गई। वैसे सत्ताधारी ट्रेंड के मुताबिक कांग्रेस पूरे राजस्थान में ही जीती थी ऐसे में क्रेडिट लेने की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। राजस्थान में 2013 के विधानसभा चुनाव नजदीक आए, तमाम सर्वे हुए। एक लिस्ट बनीं जिसमें पहली सूची में घोषित होने वाले उम्मीदवारों के नाम थे, संघर्ष, काम के रिकॉर्ड को देखते हुए सुखराम बिश्नोई का नाम भी था। लेकिन पहली तो छोडि़ए दूसरी लिस्ट में भी इनका नाम बतौर उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ। भागे-भागे दिल्ली आए, मिन्नतें कीं, लेकिन नेताओं के ना समझ आने वाले आश्वासन ही मिले। लेकिन तीसरी लिस्ट में उनका नाम आ ही गया। खास बात यह है कि इस चुनाव में जालोर-सिरोही संसदीय क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों से महज सुखराम ही कांग्रेस से जीत पाए। अब यह हाल है कि अशोक गहलोत के बाद कांग्रेस सबसे सुरक्षित सीट सुखराम बिश्नोई की मानने लगी है।

अशोक गहलोत के साथ ही राहुल गांधी भी कायल

वर्तमान में जालोर जिले से सांचौर सीट कांग्रेस के लिए काफी सुरक्षित मानी जा रही है। वजह भी साफ है। 2013 के चुनाव में सुखराम बिश्नोई की जीत के कारणों पर मंथन हुआ तो खुद कांग्रेस के पूर्व अशोक गहलोत भी उनकी तारीफ करने से नहीं चूके। उनके संघर्ष, सादगी, गांधीगिरी, व्यक्तित्व की तारीफ तो हर नेता करता, लेकिन देना उनका इनका इनाम नहीं मिला। इसके बावजूद सुखराम ने धैर्य कभी नहीं खोया। वो पहले से ज्यादा सादगी दिखाने लगे, पहले से कहीं ज्यादा मेहनत भी। एक दिन उनके धैर्य और मेहनत का नतीजा आ ही गया। अचानक राहुल गांधी बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करने सांचौर आ धमके, तारीफ की, खूब आत्मीयता दिखाई। एक ही झटके में सुखराम प्रदेश के बड़े नेता बन गए। सभी बड़े नेता सुखराम बिश्नोई की तारीफ में डूब गए।