मिर्धा का खींवसर से चुनाव लड़ने का ‘आखिरी’ दाव पड़ेगा ‘कईयों’ पर भारी


-चर्चा ए सियासत-
-मिर्धा का खींवसर से चुनाव लड़ने का
‘आखिरी’ दाव पड़ेगा ‘कईयों’ पर भारी
-असमंजस्य में पड़े निर्दलीय विधायक के समर्थक, साइलेंट मोड में आई स्थानीय जनता, बदलाव का मन बना रहा जनमानस
-डॉ.के.आर.गोदारा-
जोधपुर। राजस्थान विधानसभा के चुनाव में अब महज पांच माह का समय शेष बचे है। आगामी दिसम्बर में होने वाले चुनाव को लेकर प्रदेश की सियासत में चर्चाओं का दौर जोर पकड़ने लगा है। कहीं जातिवाद की गोटियां बिठाई जा रही है तो कहीं दूसरी जातियों के वोट पाने की खातिर जातिवाद का चोला उतारा जा रहा है। कोई भी राजनीतिक दल चाहे कितने ही जातिवादी विरोधी होने का दावे करले, लेकिन राजस्थान में हर बार चुनाव जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर ही लड़ा जाता है। कांग्रेस और भाजपा भी जातिगत हिसाब से ही टिकटों का वितरण करती है और सत्ता मिलने पर जातिगत हिसाब से ही मंत्रिमंडल का गठन होता आया है। खैर, वर्तमान में सबसे अधिक चर्चा का विषय खींवसर विधानसभा की सीट बनी हुई है। पूर्व मंत्री एवं कद्दावर कांग्रेस नेता हरेन्द्र मिर्धा इस बार खींवसर से अपना ‘आखिरी’ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। मिर्धा इस समय खींवसर विधानसभा क्षेत्र की जनता की नब्ज टटोल रहे हैं और जनता की मांग पर ही उन्होंने इस बार खींवसर से अपने राजनीतिक जीवन का आखिरी चुनाव लड़ने का एलान किया है।
मिर्धा के साथ गहरी सहानुभूति
इस बीच खींवसर विधानसभा क्षेत्र की जनता में कई तरह की चर्चाओं का बाजार गर्माता जा रहा है। इन चर्चाओं में एक गहरा राज भी छिपा है, लेकिन जनता खुलकर इस पर कुछ कहने से बचती हुई दिखाई दे रही है। खींवसर क्षेत्र के एक मतदाता ने कहा लगातार चुनाव हारने के बाद जनता की हरेन्द्र मिर्धा के साथ गहरी सहानुभूति है। वो यदि इस बार खींवसर से चुनाव लड़ते हैं तो जीत लगभग तय है। वहीं एक अन्य मतदाता का कहना था कि जनता इस बार बदलाव चाहती है, बिना पार्टी के विधायक क्षेत्र में कोई विकास तब तक नहीं करवा सकता है जब तक उसकी सत्ता में सीधी भागीदारी न हो, यूं वर्तमान विधायक हनुमान बेनीवाल ने काफी काम करवाएं भी है,लेकिन उन्ही लोगों या सरपंचों के जो उनके नजदीकी हैं। ऐसे में क्षेत्र के लोगों को समान विकास का अवसर नहीं मिल रहा है।
विकल्प की तलाश में विधायक
नाम नहीं छापने की शर्त पर एक मतदाता ने कहा कि वर्तमान विधायक हनुमान बेनीवाल भी इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि इस बार उसका चुनाव जीतना उतना आसान नहीं रहेगा। ऐसे में वो भी अन्य जगहों से चुनाव लड़ने का विकल्प तलाश रहा है। चर्चा तो यह भी है कि वर्तमान विधायक बेनीवाल नागौर या बायतु से भी चुनाव लड़ने संभावना तलाश रहा है। वर्तमान विधायक के नागौर से चुनाव लड़ने की चर्चाओं को इस बात से भी बल मिला कि हाल ही में नागौर नगरपरिषद आयुक्त और नगरपरिषद सभापति के बीच हुए टकराव के मुद्दे पर खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल ने नगरपरिषद सभापति का पक्ष लेते हुए कलक्टर से मिले थे। इससे विधायक बेनीवाल के स्वजातिय लोगों में काफी रोष भी देखा गया, लेकिन जानकारों का कहना है कि विधायक बेनीवाल ने यह सब आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए रणनीति के तहत कदम उठाया है ताकि सभापति की जाति के वोट हासिल किए जा सकें।
विधायक समर्थकों में असमंजस्य 
कांग्रेस के कद्दावर नेता हरेन्द्र मिर्धा के खींवसर से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद वर्तमान विधायक हनुमान बेनीवाल के समर्थक भी असमंजस्य में पड़ गए हैं। कारण कि पूर्व में मूंडवा और वर्तमान में खींवसर विधानसभा का क्षेत्र लगभग वही है। मिर्धा मूंडवा से विधायक और मंत्री रह चुके हैं। तब उन्होंने वर्तमान विधायक बेनीवाल के पिता रामदेव चौधरी (जनतादल) को हराकर मूंडवा सीट पर कांग्रेस का परचम फहराया था। साथ ही मिर्धा ने तब मूंडवा विधायक रहते मूंडवा क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी समेत ऐतिहासिक विकास कार्य करवाए थे जो आज तक कोई भी विधायक नहीं करवा पाया। जनता उनके कार्यों को आज भी याद करती है, लेकिन तब बदली परिस्थितियों की वजह से मिर्धा को नागौर से चुनाव लड़ना पड़ा। खींवसर क्षेत्र की जनता आज भी मिर्धा परिवार से दिल से जुड़ी हुई है। वर्तमान निर्दलीय विधायक बेनीवाल के समर्थक भी मूल रूप से मिर्धा के समर्थक ही हैं। ऐसे में मिर्धा के खींवसर क्षेत्र से चुनाव लड़ने की घोषणा से अब वर्तमान विधायक बेनीवाल के समर्थक असमंजस्य में पड़ गए हैं। जानकारों की मानें तो चुनाव के समय निर्दलीय विधायक बेनीवाल के ज्यादातर समर्थक मिर्धा के साथ जुड़ जाएंगे और मिर्धा का ‘आखिरी’ चुनाव लड़ने दाव कईयों पर भारी साबित होगा।