फिर मोदी – फिर हिंदुस्तान

मंत्रिमंडल तो ठीक, पर केंद्र में कम हो गया राजस्थान !

– नीरज दवे –

भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी वह नाम है, जो अंदाजों, आशंकाओं और कयासों के पार की शख्सियत है। कोई नहीं जान सकता कि वे सोचते क्या हैं, क्या उनके मन में है और उनके दिमाग में क्या चल रहा है।  अंदाज लग सकता होता, तो क्या 30 मई की शाम तक पूरा देश मंत्रियों की सूची का इंतजार करता ? कोई और सरकार बन रही होती, तो मंत्रियों की सूची दो दिन पहले से ही बाजार में फैल जाती। लेकिन तस्वीर भी साफ हुई, तो 30 मई की शाम को, जब राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में  शपथ समारोह में पद ग्रहण करनेवालों के लिए सजी कुर्सियों पर आकर लोग बैठ नहीं गए। मोदी को देश को ही नहीं, दुनिया को भी अकसर चौंकाते रहे हैं। दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते ही अपने साथियों के मामले में भी बहुतों को चौंकाया। वे कई सारे नाम, जिनको मंत्रिमंडल में निश्चित  तौर पर बहुत तय माना जा रहा था, 30 मई की शाम तक वे  सारे गायब हो गए। राजस्थान के मामले भी लोग शपथ ग्रहण के अंत तक ‘और कौन’ का अंजदाज लगाते रहे।  

कयास तो लग रहे थे कि राजस्थान से पांच मंत्री हो सकते हैं। लेकिन केवल तीन ही बने। जोधपुर से चुने गए गजेंद्र सिंह शेखावत राज्यमंत्री से पदोन्नत होकर केबिनेट मंत्री बने। उम्मीद थी कि छात्रनेता से राजनेता बने शेखावत के साथ आइएएस रहे अर्जुन मेघवाल भी पदोन्नत होंगे। लेकिन पिछली बार की तरह इस बार भी मेघवाल राज्यमंत्री ही बनाए गए हैं। और तीसरा मगर, चौकानेवाला नाम रहा बाड़मेर से पहली बार सांसद बने किसान नेता कैलाश चौधरी का। वे भी राज्यमंत्री बनाए गए हैं।  दरअसल, राजस्थान से जो नाम बहुत प्रचारित थे, उनमें राज्यवर्द्धन सिंह राठौर का तो लगभग तय सा ही माना जा रहा था। पीपी चौधरी भी पक्के माने जा रहे थे। लेकिन दोनों ही पटल से गायब हो गए। हालांकि पिछले कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद पीपी चौधरी पाली के ही नेता बने रहे। लेकिन युवा नेता राज्यवर्द्धन सिंह की तो मंत्रालयीन परफॉर्मेंस भी बहुत सकारात्मक और जोरदार रही। लगता है, मोदी के दिमाग में राज्यवर्द्धन के लिए कोई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का जुगाड़ है।

राजस्थान की राजनीतिक नब्ज पर बहुत गहरी पकड़ रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ केंद्रीय मंत्रिमंडल में राजस्थान को मिले प्रतिनिधित्व को प्रदेश में भावी राजनीतिक पीढ़ी तैयार करने की कवायद के रूप में देखते हैं। बारेठ का कहना है कि जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश में पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी  – पूर्वी राजस्थान और मेवाड़ की अनदेखी हुई है। मोटे तौर पर देखा जाए, तो केंद्रीय मंत्री मंडल में पश्चिमी राजस्थान को काफी तवज्जो मिली है, लेकिन बारेठ जोर देकर कहते हैं कि इस पूरी कवायद को बीजेपी की एक नई पीढ़ी तैयार करने की कोशिश के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार मानते हैं कि राजस्थान में आगे तत्काल कोई बहुत बड़ा राजनीतिक गोल सामने नहीं होना भी कम मंत्री बनाए जाने का एक कारण हो सकता है। परिहार कहते हैं कि देखा जाए, तो  राजस्थान को अब तक सालों साल मिलते रहे प्रतिनिधित्व के मुकाबले केवल तीन मंत्री बहुत कम हैं। नारायण बारेठ के नई पीढ़ी तैयार करने के आंकलन से सहमति जताते हुए राजनीतिक विश्लेषक परिहार कहते हैं कि पिछले शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई लोगों की बेहतर परख कर ली थी, उन्हें अब मंत्री न बनाकर कोई नया मोर्चा संभालने को दिया जाएगा।

बात कुछ भी हो, लेकिन नरेंद्र मोदी राजनीति के वो खिलाड़ी हैं, जो हर नुकसान में से फायदा निकालना जानते हैं। इसलिए यह कतई नहीं मान लेना चाहिए कि किसी बड़े प्रदेश को कम मंत्री देने के परिणा मउन्हें नहीं पता होंगे। और इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि बिना ज्यादा मंत्री बनाए भी वे राजस्थान को वह सब कुछ दे दें, जो मंत्री बनकर भी कोई दे न सके।  वैसे, अगर सचमुच यह बीजेपी में भावी पीढ़ी तैयार करने की कवायद भी है, तो गलत क्या है। और रही बात मोदी की, तो वैसे वे भले ही दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन हमारे हिंदुस्तान के अब तक रहे कई प्रधानमंत्रियों की सामूहिक ताकत के मुकाबले कई गुना ज्यादा मजबूत क्षमतावाले प्रधानमंत्री हैं। फिर क्या फर्क पड़ता है कि किसी प्रदेश से मंत्री कम बनें या ज्यादा।

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