लोकसभा-विधानसभा चुनाव साथ कराने की तैयारी!

– नीरज दवे
मुंबई। देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है। भाजपा हमेशा इस बात की पक्षधर रही है कि एक साथ चुनाव से उसे राष्ट्रव्यापी लाभ होगा और कमोबेश इसी मानसिकता के साथ भाजपा एक बड़ा दाव खेलने का लगभग मन बना चुकी है। लिहाजा एक साथ चुनाव करवाने की रणनीति पर कानूनी माथापेची हो रही है। पता चला है कि इस दिशा में संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से कानूनी पक्ष को मजबूत करने की तैयारी की जा रही है। कानूनी पक्ष की पूरी तैयारी के बाद राजनीतिक दलों के सामने खाका रखा जस सकता है। जब तक कानूनी खाका तैयार नहीं होता, तब तक भाजपा शासित राज्यों के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ करवाने की गुपचुप तैयारी भी की जा रही है। चुनाव आयोग अप्रेल 2019 में लोकसभा के साथ दस या ग्यारह विधानसभाओं के चुनाव करवाने की तैयारी कर रहा है। पता चला है कि इस संबंध में विधि और न्याय मंत्रालय की संसदीय समिति ने चुनाव आयोग के प्रतिनिधि को बुलाकर बात भी की है। बताते चलें कि हाल ही में विधि आयोग ने इस संबंध में चुनाव आयोग और सरकार को एक रिपोर्ट भी सौंपी है। जिसमें पहले चरण में 10 राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने की सिफारिश की गई है। हालांकि ये सभी चुनाव उन सभी तैयारियों के बिना होंगे, जिनके लिए संविधान में व्यापक संशोधन किए जाने हैं, ताकि बार-बार चुनाव टाले जा सकें। जिनमें सबसे अहम विधानसभा का कार्यकाल पांच साल निर्धारित किया जाना जरूरी है। यानि सरकारों के अल्पमत में आने के बावजूद विधानसभाओं को भंग नहीं किया जाएगा।

विधानसभाओं को भंग करने की तैयारी!

उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना विधानसभाओं के चुनाव तो वैसे भी लोकसभा चुनावों के साथ ही होने हैं। लेकिन मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं का कार्यकाल इस साल दिसंबर में समाप्त हो रहा है। इनमें मिजोरम को छोड़कर बाकी तीनों राज्य भाजपा शासित हैं। मिजोरम में ललथनहवला के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। मिजोरम को लेकर क्या स्थिति बनेगी, अभी नहीं कह सकते, लेकिन नवंबर 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं को समय पूर्व भंग किए जाने की तैयारी है। क्योंकि तीनों राज्यों के मंत्रिमंडल विधानसभाएं भंग करने की सिफारिश करेंगे, इसलिए संसद से उसकी पुष्टि किए जाने की कोई बाध्यता नहीं होगी, अगर बाध्यता हुई भी तो अब राज्यसभा में अड़चन नहीं होगी, क्योंकि वहां भी कांग्रेस सांसदों की संख्या बहुत घट चुकी है। इन विधानसभाओं को चार-पांच महीने तक भंग रखा जाएगा। इस संबंध में तीनों राज्यों से रिपोर्ट मंगवाई जा रही है। कानूनी पहलू की समीक्षा की जा रही है कि क्या विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद मौजूदा मुख्यमंत्रियों को अप्रेल तक कार्यकारी मुख्यमंत्री के तौर पर रखा जा सकता है। अगर कानूनी अड़चन के चलते राष्ट्रपति शासन लगाना भी पड़ा तो भाजपा को राष्ट्रपति शासन में ही तीनों राज्यों में चुनाव करवाने पर भी कोई ऐतराज नहीं है।

सरकार विरोधी रुझान को थामने का मानस

भाजपा नेताओं का मानना है कि विधानसभाओं को भंग करवाकर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चल रहे सरकार विरोधी रुझान को थामा जा सकता है। भाजपा आलाकमान यह मानकर चल रहा है कि लोकसभा के साथ ही तीनों राज्यों का चुनाव होने से इन तीनों राज्यों को भी जीता जा सकता है, जबकि दिसंबर 2018 में चुनाव करवाने पर अगर भाजपा तीनों ही राज्यों में कर्नाटक की तरह सरकार न बना सकी तो लोकसभा चुनावों से पहले ही भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर जाएगा। हालांकि झाबुआ से लोकसभा के उप चुनाव हारने का सिलसिला कैराना तक जारी है। बीच में गुजरात में भाजपा हारते-हारते बची है और कर्नाटक में जीतते-जीतते हारी है। जिससे भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा ही हुआ है लेकिन मोदी लोकसभा चुनाव से पहले अब अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के उपायों पर विचार कर रहे हैं।

मेक्सिको जाएगा चुनाव आयोग का प्रतिनिधिमंडल

एक साथ चुनाव कैसे करवाए जा सकते हैं, इसका अध्ययन करने के लिए चुनाव आयोग का एक प्रतिनिधिमंडल जून के आखिरी हफ्ते में मेक्सिको जा रहा है। मेक्सिको में पहली जुलाई से पांच जुलाई के बीच वहां के राष्ट्रपति, संसद, विधानसभाओं और स्थानीय इकाइयों के चुनाव एक साथ हो रहे हैं। चुनाव आयोग का प्रतिनिधिमंडल एक सप्ताह तक मेक्सिको के चुनावों को देखेगा और वहां की संवैधानिक पेचीदगियों को समझकर सरकार को रिपोर्ट पेश करेगा।

झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र पर भी निशाना

सितंबर 2019 में जिन तीन विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उन सभी तीनों राज्यों झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में भी भाजपा सरकारें हैं, इसलिए उन सभी विधानसभाओं को पांच महीने पहले मार्च के पहले हफ्ते में भंग करने की सिफारिश कर के लोकसभा के साथ ही चुनाव करवाने का रास्ता साफ किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह साल का होता है, जो कि सितंबर 2020 में समाप्त होगा, लेकिन वहां पीडीपी के साथ भाजपा की साझा सरकार है। इसलिए एक विचार यह भी होगा कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा को भी भंग कर साथ ही चुनाव करवा दिए जाएं। अगर जम्मू-कश्मीर का चुनाव साथ न भी हो, तो भी दस राज्यों का चुनाव तो लोकसभा के साथ हो ही सकता है। इनमें मिजोरम को छोड़कर बाकी नौ राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और अगर लोकसभा चुनावों में मोदी का करिश्मा काम रहता है तो उसका लाभ भाजपा को उन नौ राज्यों में भी मिलेगा, जहां भाजपा के मुख्यमंत्री एंटी इमकेंबेसी यानि सत्ता विरोधी रुझान को महसूस कर रहे हैं।