दलित वोट बैंक का केन्द्र बना नागौर, बसपा की दबे पांव दस्तक!

वर्ष 2015 का डांगावास प्रकरण, 2017 का डेल्टा मेघवाल व 2018 का पुलिसकर्मी गेनाराम सामुहिक खुदकुशी प्रकरण ने देशभर में सुर्खिया बंटोरने के बाद अब नागौर दलित नेताओं का राजनीतिक केन्द्र बन गया है। प्रदेश में चुनाव को महज छह माह से कम समय बचा है ऐसे में दलितों के वोट एकत्रित करने व खुद को दलितों के बड़ा नेता होने का तमगा लगाने के लिए राष्ट्रीय नेताओं की नजर नागौर पर है।

जयपुर। वर्ष 2015 का डांगावास प्रकरण, 2017 का डेल्टा मेघवाल व 2018 का पुलिसकर्मी गेनाराम सामुहिक खुदकुशी प्रकरण ने देशभर में सुर्खिया बंटोरने के बाद अब नागौर दलित नेताओं का राजनीतिक केन्द्र बन गया है। प्रदेश में चुनाव को महज छह माह से कम समय बचा है ऐसे में दलितों के वोट एकत्रित करने व खुद को दलितों के बड़ा नेता होने का तमगा लगाने के लिए राष्ट्रीय नेताओं की नजर नागौर पर है। गुजरात चुनाव में दलितों के यंग लीडर के रूप में सामने आए जिग्नेश मेवाणी पुलिस रोक के बाद नागौर में दो सभाए कर चुके है। गुजरात आंदोलन में उनके सारथी रहे व पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल भी उनके समर्थन में गत दिनों पुष्कर के पास नागौर में दस्तक दे चुके है। नागौर के डांगावास, गेनाराम व उसके परिवार की मौत के अलावा बीकानेर में दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल की मौत के मामलों से दलित नेता चुनावी लाभ लेना चाहते है। इस लिए प्रदेश की तीसरी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी ने तो आगामी चुनावी प्रचार की शुरूआत ही नागौर से की है। गत दिनों पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों ने नागौर से बसपा के चुनावी रथ को रवाना कर दिया है।
प्रदेश में लंबे समय तक दलित वोट बैंक कांग्रेस के खाते में जाते रहे है। इस बीच वर्ष 2004-05 में बसपा ने प्रदेश की राजनीति में सक्रिय दस्तक देकर कांग्रेस व बीजेपी की निंद उड़ा दी। बसपा ने अपनी नीति के अनुसार दलित व निचले तबके के लोगो को लेकर प्रदेश में राजनीतिक एंट्री की जिसमें उसने पहले ही चुनाव में बड़ी सफलता हासिल की। उसके बाद लगातार उसकी सीटों का ग्राफ बढ़ता गया। 2014 के चुनाव में बसपा एक बार फिर से पिछड़ गई मगर बीजेपी के राज में प्रदेश के तीन बड़े दलित उत्पीड़न के मामलों ने दलितों को प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने का मौका दे दिया। अवसर का फायदा उठाते हुए कई राष्ट्रीय दलित नेता आगामी चुनाव से पहले राजस्थान में दलितों के वोटो में सेंध लगा कर खुद का वजूद बनाने की जुगत में है।
बॉक्स-दो अप्रेल के बंद के बाद बीजेपी से छिटके दलित
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के निर्णय के बाद दो अप्रेल को देशभर में हुए हिंसक आंदोलन के बाद दलित खासकर बीजेपी से छिटकते नजर आए। केन्द्र व राज्य सरकार ने दलित वोटो की खातिर कानून कार्यवाही की और दलितों पर दर्ज केस भी वापस लेने की तैयारी में है मगर अंदरखाने खबर यह है कि इस चुनाव में दलित कांग्रेस-बीजेपी के अलावा अन्य विकल्प की तलाश कर रहे। इसी लिए दलित नेता प्रदेश में लगाताद दौरा कर दलित वोट को अपनी तरफ मोड़ने की जुगत में लगे है।
पेज एक पर फोटो है।

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