टिकटों को लेकर अभी तक पूछा तो नहीं है….लेकिन पूछेंगे तो राय जरूर दूंगा – मानवेन्द्र

बाड़मेर . पश्चिमी राजस्थान के कद्दावर नेताओं में से एक मानवेंद्र सिंह अब कांग्रेस के हो चुके हैं. वे कांग्रेस के खेमे में बैठकर पार्टी की जीत के लिए रणनीति बनाने की बात कर रहे हैं. लेकिन, उस मोर्चे से नदारद हैं जहां पार्टी हर रणनीति को अंजाम देने में जुटी है. ऐसे में चुनावी मैदान में बन रहे समीकरण के बीच मानवेंद्र की भूमिका को लेकर सवालों के साथ ही चर्चाओं का बाजार गर्म होता जा रहा है.
कांग्रेस में शामिल होने के बाद मानवेंद्र बाड़मेर पहुंचे तो यहां हुए स्वागत से खुश होकर उन्होंने कहा कि ‘मैं अब वास्तव में अपने घर आया हूं, मुझे पहले ही आ जाना चाहिए था’. वहीं, कार्यकर्ताओं के बीच उन्होंने एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में टिकट के मामले में खुद की भूमिका को साफ करते हुए कहा कि ‘मेरी पैरवी जरूर रहेगी,  हम जिताऊ उम्मीदवार की बात करेंगे. साथ ही खुले मन से पार्टी को जिताने वाले उम्मीदवारों की पैरवी करेंगे’. लेकिन, खास बात यह है कि जहां वे अपनी पैरवी की बात कर रहे हैं, वहां तो मानवेंद्र शामिल ही नहीं हैं. राजस्थान के हर विधानसभा सीट पर प्रत्याशियों के चयन को लेकर दिल्ली में मशक्कत जारी है. दिल्ली में गहलोत-पायलट के साथ ही अन्य बड़े नेताओं की मौजूदगी में  हर सीट पर मंथन किया जा रहा है. प्रत्याशियों के पैनल को लेकर चल रही इस महत्वपूर्ण बैठक में मानवेंद्र सिंह की गैर मौजूदगी कइयों के मन में सवाल खड़े कर रहा है.
इसमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस की जीत और सरकार बनाने के लिए हर टास्क को पूरा करने के लिए तैयार मानवेंद्र को आखिर दिल्ली में चल रही महत्वपूर्ण बैठकों से दूर क्यों रखा गया है. उन्हें प्रत्याशियों के चयन के मामले में इस बैठक में शामिल क्यों नहीं किया गया है. ये सवाल इसलिए जहन में आ रहे हैं, क्योंकि  मानवेंद्र की कांग्रेस में एंट्री के दौरान प्रदेश के चुनाव में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर कई कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन, कांग्रेस में शामिल होने के बाद चुनावी रणनीति को लेकर हो रही बैठकों से मानवेंद्र की दूरी कई चर्चाओं को जन्म दे रही है. दरअसल, वे चुनाव को लेकर बनी कांग्रेस की किसी भी कमेटी में शामिल ही नहीं हैं. जिस मानवेंद्र के जरिए कांग्रेस प्रदेश में राजपूतों को साधने की कोशिश कर रही है, उन्हें अभी तक किसी चुनावी कमेटियों में भी जगह नहीं दी गई है.
उन्हें इन कमेटियों से दूर रखा गया है, जिनके जरिए कांग्रेस पूरे चुनाव को साधेगी.  ऐसे में ये सवाल सभी जहन में बार-बार आ रहा है कि जब मानवेंद्र को टिकटों के लिए जारी मंथन से लेकर कमेटियों में जगह नहीं दी गई है तो फिर उनकी कौन सी भूमिका चुनाव में रहने वाली है?. क्या महज मानवेंद्र को पार्टी में शामिल करने भर तक ही पार्टी उतावली थी? . आपको बता दें कि मानवेंद्र मारवाड़ में राजपूतों के बड़े नेताओं में से एक हैं. पूर्व विदेशमंत्री जसवंत सिंह के बेटे होने के कारण राजपूतों के बीच उनका राजनीतिक प्रभाव भी काफी अच्छा है. इसे जानने के बाद भी कांग्रेस की ओर से मानवेंद्र को चुनावी रणनीति से दूर रखना सियासतदारों के कान खड़े कर रहा है. आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्व विदेशमंत्री जसवंत सिंह को  टिकट नहीं दिए जाने के बाद से भाजपा से मानवेंद्र सिंह और उनका परिवार नाराज था. साढ़े चार साल की राजनीतिक चुप्पी के बाद मानवेंद्र ने भाजपा को छोड़कर कांग्रेस को ज्वाइन कर लिया.

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