सवर्ण समाज की नाराजगी बिगाड़ ना दे बीजेपी के समीकरण

बीजेपी और कांग्रेस में लगातार सियासी दांव पेंच जारी है. विभिन्न समाजों के लोग अपने-अपने प्रतिनिधित्व की मांग दोनों पार्टियों से प्रमुखता से कर रहे हैं. मगर इनमें स्वर्ण समाज की नाराजगी इस बार बीजेपी से ज्यादा दिख रही है. एसटी-एससी बिल एक बड़ा कारण है, लेकिन पिछले कुछ सालों में जो घटनाक्रम हुए. उससे बीजेपी के परंपरागत सवर्ण वोट बैंक पर खासा असर पड़ा है. बात अजमेर की करें तो, जिले की आठों विधानसभा सीटों पर जातिगत समीकरण बैठना कांग्रेस और भाजपा के लिए आसान नहीं है. जिले में एससी, अल्पसंख्यक, गुर्जर, जाट, रावत, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य बड़ी जातियां है. ऐसे में हर जाति के लोग राजनैतिक पार्टियों पर दबाव बना रहे कि उनकी जात के व्यक्ति को प्रतिनिधित्व मिले. यह तो तय है कि राजनीति में सबको खुश नहीं रखा जा सकता. मगर कुछ समाज ऐसे भी है जिन्हें पिछले एक दशक से कभी प्रतिनिधित्व ही बीजेपी ने नहीं दिया.

स्थानीय वैश्य समाज को कभी प्रतिनिधित्व नहीं दिया
बात वैश्य समाज की करते है तो बीजेपी ने स्थानीय वैश्य समाज को कभी प्रतिनिधित्व नहीं दिया. साल 2009 में लोकसभा चुनाव में किरण माहेश्वरी को बीजेपी ने टिकट दिया था, मगर पैराशूट उम्मीदवार को स्थानीय जनता पचा नहीं पाई और सचिन पायलट के सिर जीत का सहारा बांध दिया. इसके बाद भी वैश्य समाज लगातार प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा. जबकि वैश्य समाज में 90 फीसदी लोग व्यापारी वर्ग से है और इनमें ज्यादातर बीजेपी विचारधारा के समर्थक है. माहेश्वरी प्रगति संगठन के अध्यक्ष राजेंद्र ईनाणी ने बताया कि बीजेपी ने वैश्य समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है. जिले से पिछले डेढ़ दशक में बीजेपी ने एक बार भी वैश्य समाज को टिकट नहीं दिया. लगातार मांग के बाद बीजेपी ने अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पर शिव शंकर हेड़ा को आसीन किया. जबकि कांग्रेस ने जिले में तीन बार वैश्य समाज के व्यक्ति को टिकट दिया. इस बार फिर वैश्य समाज ने दोनों राजनैतिक संगठनों से टिकट की डिमांड की है. इसके अलावा माहेश्वरी समाज की नाराजगी नोटबन्दी और जीएसटी को लेकर भी है. व्यापार में मंदी से हर व्यापारी परेशान है.

सवर्ण समाज भी बीजेपी से नाराज
वही एसटी-एससी बिल को लेकर सरकार के रुख के बाद तो सवर्ण समाज बीजेपी से ज्यादा नाराज है. मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वो कांग्रेस से खुश है.  राजस्थान ब्राह्मण महासभा के संभागीय विधिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष योगेंद्र ओझा का कहना है कि ब्राह्मण समाज की नाराजगी का कारण शिक्षा राज्यमंत्री देवनानी है. ब्राह्मण समाज पर की गई टिपण्णी से देवनानी के प्रति समाज में आक्रोश था. मगर इस आक्रोश को ओर हवा तब लगी जब बीजेपी ने देवनानी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।. नतीजतन ब्राह्मण समाज बीजेपी को ब्राह्मण विरोधी समझने लग गया. सरकार में अरुण चतुर्वेदी के अलावा किसी अन्य ब्राह्मण को कैबिनेट में नहीं लेने से भी समाज में बीजेपी के प्रति नाराजगी है. इसके अलावा अजमेर में नगर निगम चुनाव में मेयर की सीट सामान्य वर्ग की आरक्षित सीट पर ओबीसी वर्ग के व्यक्ति को मेयर का टिकट दिए जाने से भी सवर्ण समाज आहत हुआ, तो एसटी एससी एक्ट का बिल लोकसभा में पारित होने के बाद तो ब्राह्मण समाज ही नहीं, अपितु सवर्ण समाज की नाराजगी फूट पड़ी थी. अजमेर बन्द कर सवर्ण समाज ने बीजेपी को अपना कड़ा विरोध भी जता दिया था.

राजपूत समाज की भी नाराजगी किसी से छुपी नहीं

वहीं राजपूत समाज की बात करें तो क्षत्रिय महासभा के सचिव चंद्रभान सिंह का कहना है कि आनंदपाल एनकाउंटर प्रकरण के बाद से राजपूत समाज की बीजेपी से नाराजगी किसी से छुपी नहीं है. बावजूद इसके समाज प्रतिनिधित्व दिए जाने की मांग कांग्रेस और भाजपा से कर चुका है. अजमेर में लोकसभा उपचुनाव में ब्राह्मण और राजपूत समाज की नाराजगी से बीजेपी को नुकसान हुआ था. वहीं अजमेर में नगर निगम की सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित मेयर की सीट पर सुरेंद्र सिंह शेखवात की दावेदारी को अनदेखी करने के कारण से भी क्षत्रिय समाज में नाराजगी है. समाज आरक्षण की मांग को लेकर भी अपनी नाराजगी पहले जाता चुका है. वही एसटी-एससी एक्ट विधेयक को पारित करने से समाज मे बीजेपी के खिलाफ माहौल बन गया है. हालांकि चुनाव के रण में उम्मीदवार कौन होंगे यह अभी तय नहीं है. मगर राजनीति में हावी होते जातिवाद में सवर्ण समाज राजनीति रूप से खुद को पिछड़ा समझने लगा है. चुकी राज्य में सत्ता बीजेपी की रही है तो अपेक्षा भी सवर्ण समाज की सत्ता से थी. बीजेपी को भी अपने वोट बैंक में हुए डेमेज की सुध है. मगर इस डेमेज को कितना कंट्रोल किया गया यह तो आगामी चुनाव परिणाम तय करेगा.