बहुत कुछ कह गए वसुंधरा और गहलोत के बीच वो 15 मिनट

जोधपुर। अशोक गहलोत के बड़े भाई का निधन दशहरे के दिन हो गया. जोधपुर में उनके पैतृक निवास पर शनिवार को तीये की बैठक थी. अशोक गहलोत सिर पर साफा पहने सभी से हाथ जोड़कर मिल रहे थे. वे जमीन पर बैठे थे. शामियाना था. लंबा-चौड़ा. जो भी उनके जानकार थे. करीबी थे. अशोक गहलोत से मिलने आए हुए थे. सचिन पायलट भी आए. अविनाश पांडे भी आए. गली-मुहल्ले, गांव-देहात सब ओर से उनसे मिलने वाले आए. गहलोत सभी से आत्मीय भाव से मिले.
वसुंधरा भी आईं. गहलोत सफेद गद्दों पर बैठे थे. उनके पीछे दिवंगत भाई की तस्वीर थी. सामने लाल कालीन बिछी हुई थी. कालीन के दोनों ओर सफेद शामियाने के नीचे सफेद ही रंग के लिहाफ चढ़े गद्दे थे. लोग बैठे थे. वसुंधरा, लाल कालीन से चलते हुए गहलोत से मिलने पहुंची. गहलोत ने नीचे बैठे-बैठे ही वसुंधरा को नमस्कार किया. वसुंधरा पहले ही हाथ जोड़े हुए थी. वसुंधरा….गहलोत के सामने नहीं बैठना चाहती थी. इसलिए साइड में लिहाफ वाले गद्दे पर जगह ढूंढने लगी. लेकिन कोई जगह खाली नहीं थी. तभी गहलोत के खातिमों ने गहलोत के सामने गद्दे पर तकरीबन साफ करते हुए उन्हें वहां बैठने को कहा. वसुंधरा, सिर पर पल्लू के संभालते हुए वहां बैठ गईं. उन्होंने गहलोत से नजरें नहीं मिलाईं. गहलोत लगातार उनपर निगाह रखे हुए थे. वसुंधरा उनके घर आई थी. चाहे वजह कोई भी हो. इसलिए गहलोत का फर्ज बनता था कि वसुंधरा का अक्स भी उनकी ओर मुड़े तो वे तुरंत तत्पर दिखें. ऐसा हुआ भी….वसुंधरा ने थोड़ा पल्लु दबाते हुए उनसे पूछा…..चूंकि भीड़ थी……शोर भले ही ना हो….लेकिन दोनों के बीच रामा-शाम इतनी क्षण-भर की थी हम खबरनवीसों के कानों में ना पड़ पाई और ना ही हमारे कैमरे आवाज पकड़ पाए. खैर…फिर वही स्थिति हो गई….गहलोत के खास ….वसुंधरा को परिवार और सबके बारे में बताने लगे. वसुंधरा…ध्यान से सबकुछ सुनने लगी……काफी देर सुनने और अपना जवाब देने के बाद वसुंधरा ने गहलोत से बात की. गहलोत ने आगे झुकते हुए उनकी बात सुनी और जवाब दिया. थोड़ी देर बात वसुंधरा बेतकल्लुफ हो गईं…उनका बायां हाथ….सहारे के लिए लिहाफ वाले गद्दे पर जा टिका. उन्होंने अपने सारे शरीर का वजन उस हाथ पर टिका दिया. उसी हाथ से दो हाथ दूर गहलोत बैठे थे… सबकुछ यूं ही था. बेतकल्लुफ…इस बीच केन्द्रीय मंत्री पीपी चौधरी भी आए. वे भी जमीन पर बैठे. माहौल से राजनीति कहीं दूर जा चुकी थी. वसुंधरा…ने अपने आपको उस गम के माहौल में आत्म-सात कर लिया था. वे सहज बैठी रहीं. बायें हाथ के सहारे. करीब 15 मिनट चले इस रूक-रूककर वार्तालाप में बहुत कुछ देखने, समझने को मिला. दोनों के मन में एक-दसरे के लिए बोले गए बयान चल रहे थे या कुछ और यह तो गहलोत और वसुंधरा ही जानते होंगे. लेकिन इतना जरूर है कि चल जरूर रहा होगा…दोनों के मन में यह सबकुछ… खैर,…इजाजत लेते हुए वसुंधरा उठीं….अक्सर महिलाओं के लिए या यूं कह लीजिए पुरूषों के लिए जमीन से उठकर चलना आसान नहीं होता है. लेकिन वसुंधरा ने बीते दो महीनों में मंदिरों के दर्शन करते-करते इतनी बार जमीन पर बैठकर उठी हैं कि उन्हें तनिक भी मुश्किल नहीं हुई. वे उठीं. गहलोत को हाथ जोड़कर अभिवादन किया और भीड़ में जगह बनाती हुई चली गईं. गहलोत नीचे बैठे रहे.