परंपरागत वोटर्स साधने में छूट रहे भाजपा-कांग्रेस के पसीने

-राजपूत, जाट, गुर्जर व मीणा समुदायों में वोट बैंक बनाए रखने के लिए कई दिग्गज उतरे मैदान में
रोहित पारीक
पाली। विधानसभा चुनाव के रण में उतरी भाजपा व कांग्रेस भले ही कितने ही दावे कर लें कि वे जातिकार्ड का इस्तेमाल नहीं कर रही है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। सत्ता की कुर्सी पाने के लिए दोनों ही दलों ने परंपरागत वोटर्स को अपने पाले में करने की तैयारी कर ली है। प्रदेश में राजपूत, जाट, गुर्जर और मीणा समुदाय बहुतायत में है। प्रदेश की आबादी में चारों जातियों की हिस्सेदारी लगभग तीस फीसदी है। ऐसे में इन जातियों के समीकरण साधने में दोनों दलों को दिन-रात एक करने पड़ रहे हैं।
राजपूत समाज नहीं खोल रहा पत्ते
200 सदस्यीय विधानसभा में हर बार राजपूत समुदाय से 15 से 17 विधायक निर्वाचित होते रहे हैं। इनमें से अधिकतर भाजपा के होते थे। मौजूदा विधानसभा में राजपूत समुदाय के 27 विधायक हैं, जिनमें से 24 भाजपा से हैं। राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 5 से 6 फीसदी है। इस बार राजपूत अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। बीजेपी के कद्दावर नेता रहे जसवंत सिंह की अनदेखी का आरोप लगाकर उनके बेटे मानवेन्द्र सिंह ने पिछले दिनों स्वाभिमान के बहाने कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया। स्वाभिमान रैली में जिस तरह मानवेन्द्र ने राजपूत समाज की भीड़ खींची, उससे भाजपा की चिंता बढ़ गई है। राजपूत करणी सेना ने भी हाल ही में राजधानी में हुंकार रैली के जरिए बीजेपी और कांग्रेस को अपनी ताकत दिखाने की तैयारी की। राजपूत समाज को परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थक माना जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने जनसंघ के समय से इस समुदाय को जोडक़र रखा। 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद शेखावत ने दो बार राज्य की बागडोर संभाली। वे 1990 से 1992 और 1993 से 1998 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद 1992 में उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई थी। इससे पहले आपातकाल के बाद 1977 में राज्य में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उस वक्त भी वह सरकार के मुखिया बने, तब से राजपूत समुदाय भाजपा से खास तौर पर जुड़ा हुआ था। राजस्थान की राजनीति में राजपूतों का दबदबा रहा है। इस बार इस समाज के सभी समीकरण उलझे हुए है। ऐसे में राजपूत वोट इस बार एकमुश्त किधर जाएगा अभी कहना मुश्किल है।
बेनीवाल के साथ जुड़ रहे जाट समुदाय से कांग्रेस चिंतित
1999 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जाट समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर आरक्षण का लाभ दिलवाया था। इसके बाद से यह समुदाय कांग्रेस और भाजपा के बीच बंटा है। राज्य में इस समुदाय की आबादी सबसे अधिक यानी करीब 10 फीसदी है। इससे पहले 1998 में कांग्रेस ने राज्य में बहुमत मिलने के बाद एक गैर जाट नेता अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया था, जबकि जाट नेता परसराम मदेरणा को स्वाभाविक दावेदार माना जाता था, तब से जाट समुदाय कांग्रेस से दूर होता चला गया। नागौर के खींवसर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने हाल ही में इस समुदाय का झंडा थामकर भाजपा-कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती पेश की है। राज्य में जाट समुदाय सबसे प्रभावी है। उनकी आबादी भी अच्छी-खासी है और विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व भी अच्छा रहा है। इन दिनों समुदाय के बड़े नेता और बाड़मेर से सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी भाजपा में अलग-थलग पड़े हैं। कुछ ऐसे ही हालात अन्य जाट नेताओं के है, जिन्होंने कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामा था। ऐसे में माना जा रहा था कि इस बार जाट कांग्रेस की तरफ जा सकते हैं, लेकिन मानवेन्द्र सिंह के कांग्रेस में शामिल होने से कांग्रेस का जाटों का साधने का समीकरण कमजोर होता दिख रहा है। बेनीवाल भी जाट समुदाय का रूख कांग्रेस की तरफ मोडऩे से रोकने की कोशिश में लगे हैं। राज्य के शेखावाटी क्षेत्र यानी सीकर, झुंझुनूं और चूरू जिले के अलावा मारवाड़ यानी पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर और नागौर जिलों में इस समुदाय का वर्चस्व है।
गुर्जर और मीणा किसका देंगे साथ, तय नहीं
परंपरागत रूप से गुर्जर समुदाय को भाजपा का वोट बैंक माना जाता है, क्योंकि उनकी कट्टर विरोधी जाति मीणा परंपरागत रूप से कांग्रेस का समर्थन करती है। 1980 में इस समुदाय के नेता राजेश पायलट के राजनीति में आने और कांग्रेस के टिकट पर भरतपुर से सांसद चुने जाने के बाद गणित उलझ गया। अभी इस जाति के सबसे कद्दावर नेता राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट हैं, जो कांग्रेस के बैनर पर चुनावी समीकरण साध रहे है। मौजूदा समय में गुर्जर मानते हैं कि उनके पास अपनी जाति के नेता सचिन पायलट को सीएम बनाने का सबसे उपयुक्त समय है। आरक्षण के मुद्दे को लेकर गुर्जर समुदाय लम्बे समय से भाजपा से नाराज है। 2007 और 2008 के गुर्जर आंदोलन के दौरान हिंसा में करीब 70 गुर्जर युवक मारे गए थे। ऐसे में इस बार गुर्जर समुदाय के लोग कांग्रेस की ओर झुक सकते हैं। ऐसे में भाजपा अब गुर्जर समुदाय के परंपरागत विरोधी मीणा समुदाय पर दांव लगा रही है। पार्टी ने इस समुदाय के सबसे बड़े नेता किरोड़ी लाल मीणा को फिर से पार्टी में शामिल किया है। वसुंधरा राजे के साथ मतभेद के कारण पूर्व सांसद मीणा ने 2008 में पार्टी छोड़ दी थी। ये दोनों जातियां दौसा, करौली, सवाई माधोपुर और टोंक जिले में करीब-करीब बराबर हैं। दोनों 6-6 फीसदी के आस-पास हैं।

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