एक वोट से अटलजी की सरकार चली गई थी तो 1 MLA कैसे छोड़ देगी वसुंधरा

जयपुर . चुनाव के सियासी अखाड़े में सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा-कांग्रेस के बीच  कुश्ती जारी है. वहीं, इससे इतर भाजपा के भीतर भी युद्ध के मैदान में उतरने की तैयारी हो रही है. पहले प्रदेशाध्यक्ष और अब पार्टी के प्रत्याशियों के चयन को लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बीच तलवार खिंचने के संकेत मिल रहे हैं. प्रत्याशियों के चयन को लेकर दोनों नेताओं की अलग-अलग सोच के बीच आम सहमति बनना इतना आसान नजर नहीं आ रहा है.
चुनाव में पार्टी का चेहरा वसुंधरा राजे हैं. इसलिए वह चाहती हैं कि टिकटों का वितरण भी उन्ही के अनुसार हो. लेकिन, शाह कुछ अलग ही संकेत दे रहे हैं. शाह की ओर से कराए जा रहे आंकलन और रायशुमारी के बीच कई मौजूदा मंत्रियों और विधायकों के टिकट पर तलवार लटकती नजर आ रही है. इनमें अधिकतर वे विधायक और मंत्री हैं जो कि वसुंधरा के साथ खड़े रहते हैं. ऐसे में वसुंधरा भी पहले से ही सतर्क हो चुकी हैं. साथ ही वे पार्टी की बैठक में भी संकेत दे चुकी हैं कि टिकट तो वही बांटेंगी. उनके ऐसा कहने के पीछे प्रमुख कारण यह है कि  वसुंधरा अच्छी तरह से जानती हैं कि एक एमएलए भी हाथ से गया तो उसका असर क्या होगा.
क्योंकि, एक वोट से ही तो अटलजी की भी सरकार गिर गई थी. इसलिए वसुंधरा टिकट वितरण के मामले में शाह को हाथ भी नहीं रखने देना चाहती हैं. राजस्थान के चुनाव से पहले प्रदेशाध्यक्ष के मुद्दे पर दोनों नेता आमने-सामने हो चुके हैं. चुनाव की बारी आई तो शाह ने चुनाव प्रबंधन समिति में अपने खास गजेंद्र सिंह शेखावत को संयोजक बनाकर पुरानी कसर पूरी कर दी. शेखावत के संयोजक बनने के बाद से वसुंधरा पार्टी अध्यक्ष शाह की सभा से दूरी बनाए हुए हैं. लेकिन, अब टिकट को लेकर जो मशक्कत शुरू हुई है, उसके दरमियान दोनों नेताओं के फार्मूले आड़े आते दिखाई दे रहे हैं.  सूत्रों की मानें तो पार्टी की पहली सूची दीपावली के आसपास तक ही जारी हो पाएगी. टिकट वितरण के मामले में पहले से स्पष्ट संकेत दे रही वसुंधरा चाहती हैं कि वे ही सारे टिकटों का फैसला करें. वसुंधरा की ओर से टिकट बांटने को लेकर दिए स्पष्ट  संकेत के पीछे कई  कारण हैं.
प्रदेश में 15 साल से पार्टी का प्रमुख चेहरा रही वसुंधरा के खेमे में करीब 125 विधायक माने जाते हैं. जिन्हें टिकट कैसे बांटना है यह केवल वसुंधरा के ऊपर ही निर्भर है. वहीं, संगठन के स्तर पर भी सभी जिलाध्यक्ष उन्हीं के खेमे के हैं. इन जिलाध्यक्षों से वसुंधरा हर जमीनी फीडबैक ले रही हैं. संगठन में जमीनी स्तर तक पकड़ रखने वाली वसुंधरा इसी ताकत के बल पर साफ कहती हैं कि टिकट वही बांटेंगी. वहीं, शाह  राजस्थान में धीरे-धीरे जो पकड़ बना रहे हैं उसे ढीला करने के मूड़ में नहीं है. दिल्ली वाले भी चुनावी मैदान में टिकट वितरण की कमान अपने हाथ रखते हुए हर फैसला लेना चाहते हैं. इसीलिए वे अपने खास मंत्रियों और संगठन के नेताओं को मैदान में उतारकर जमीनी आकलन कराने में जुटे हैं. शाह के मंत्री और नेता जमीनी आंकलन के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं. जिसे वे कुछ दिन में शाह को सौंप देंगे.
जानकारों का कहना है कि इस सर्वे रिपोर्ट में वसुंधरा के कई खास मंत्रियों और विधायकों की गरदन भी फंस रही है. यही वजह है कि वसुंधरा टिकट की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं. जिससे उनके टिकट वितरण की राह में कोई खलल नहीं पड़े. क्योंकि, सर्वे के दौरान प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना, प्रदेशाध्यक्ष मदनलाल सैनी सहित कई नेता लगातार कह रहे हैं कि कई मंत्रियों और विधायकों के टिकट कटेंगे. राजनीति के जानकारों का कहना है कि टिकट वितरण पर दोनों के अलग-अलग फॉर्मूले के बीच प्रत्याशी का चयन आसान नहीं है.
माना जा रहा है कि दोनों के अपने-अपने सर्वे रिपोर्ट में जिन सीटों पर आसानी से सहमति बन जाएगी. उन पर प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी जाएगी. लेकिन, जिन सीटों पर दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आएंगे. उन पर प्रत्याशी का चयन होने में काफी समय लग सकता है. इस स्थिति को टिकट के दावेदार भी समझ रहे हैं. लेकिन, टिकट कौन बांटेगा ये स्पष्ट नहीं होने के चलते वे दोनों दरबारों में हाजिरी लगाते हुए आशीर्वाद के इंतजार में खड़े हैं.