राजस्थान में भाजपा का सबसे बड़ा ‘इक्का’ इस बार कम फेंटा जाएगा

जयपुर . सत्ता को बरकरार रखते हुए दूसरी बार जीत हासिल करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है. चुनावी रण में कांग्रेस को मात देने के लिए रणनीति  बनाने में जुटी भाजपा हर चाल चल रही है. वहीं, चुनाव की घोषणा होने के बाद से पार्टी नेताओं की निगाहें पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ लगी हुई है. लेकिन, इस बार पार्टी का शीर्ष नेतृत्व मोदी की विधानसभा चुनाव में ज्यादा सभाएं कराने के मूड़ में नहीं है. इस संबंध में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हाल में प्रदेश नेताओं को संकेत भी दे दिया है. शाह के इस संकेत भर से प्रदेश के नेताओं में खलबली मची हुई है.
चुनाव के समर में उतरी भाजपा की राह में इस बार कई मुश्किलें खड़ी हैं. राज्य में बने एंटी  इंकंबेसी के चलते पार्टी पहले से सियासी मुश्किलों का सामना कर रही है. वहीं, पार्टी से राजपूत समाज की नाराजगी भी अब तक दूर नहीं हो सकी है. ऊपर से  कांग्रेस लगातार सियासी वार कर रही है. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी भी सभाओं के साथ ही रोड शो के जरिए  सियासी हवा को कांग्रेस की तरफ  मोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. ऐसे में भाजपा के लिए चुनावी भंवर के बीच से विजय पताका लहराना  आसान नहीं है. इसे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित प्रदेश के सभी नेता अच्छे से समझ रहे हैं. हालांकि, एंटी इंकंबेसी को खत्म करने के लिए पार्टी स्तर पर हर मोर्चे पर रणनीति को तैयार की जा रही है.
लेकिन, पार्टी की अंतिम निगाहें मोदी पर ही टिकी हुई है. पार्टी के नेताओं का कहना है कि मोदी की सभाएं होनी शुरू होंगी तो सियासी हवा भी बदलने लगेगी. लेकिन, सूत्रों की मानें तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस बार राजस्थान सहित एमपी और छत्तीसगढ़ में मोदी की ज्यादा सभाएं नहीं कराने के संकेत दे दिए हैं. साथ ही सीएम वसुंधरा राजे को ज्यादा से ज्यादा चुनावी सभा करने के लिए भी कहा है. सूत्रों की मानें तो शाह इस बार पिछले चुनाव की तुलना में आधी सभाएं ही राजस्थान में मोदी की कराना  चाहते हैं.  ऐसी ही योजना एमपी और छत्तीसगढ़ को लेकर भी बन रही है. पार्टी के उच्च सूत्रों ने बताया कि  पार्टी आलाकमान इस बार राजस्थान में मोदी की करीब 9 से 12 सभाएं कराना चाहते हैं. जिसमें से दो सभाएं मोदी की हो चुकी हैं. एक जयपुर में जिसे लाभार्थी सम्मेलन बताया गया वहीं दूसरी अजमेर में. उनका कहना है कि आलाकमान मोदी की शेष रैली राज्य में उन स्थानों पर कराना चाहते हैं, जहां पार्टी की स्थिति ज्यादा कमजोर है. आपको बता दें कि पिछले चुनाव के दौरान मोदी की 21 सभाएं हुई थी.
इस बार मोदी की सभाएं कम कराने के पीछे शीर्ष नेतृत्व लोकसभा चुनाव के समीकरण को देख रहे हैं. सूत्रों ने बताया कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी के शीर्ष नेतृत्व अपने सबसे बड़े प्रचारक को सियासी मैदान में ज्यादा नहीं उतारना चहते हैं. इसके पीछे पार्टी की लोकसभा को लेकर की जा रही तैयारी को मुख्य बताया जा रहा है. हालांकि, राज्य के नेता मोदी की सभाएं ज्यादा से ज्यादा कराने के लिए दिल्ली तक जोर लगा रहे हैं. सूत्रों ने बताया कि पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को 100 से अधिक चुनावी सभाएं करने को कहा है.
जबकि, 2013 के चुनाव में सीएम राजे ने कुल  87 सभाएं की थी . उन्होंने कहा कि पार्टी ने यह भी तय कर दिया है कि पूरा चुनाव मुख्यमंत्री के चेहरे को आगे रखकर लड़ा जाएगा. हालांकि, चुनाव के रण में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह  करीब एक दर्जन सभाएं करेंगे. इसके लिए उन्होंने पार्टी के नेताओं से अपनी सहमति भी दे दी है. मोदी की सभाएं इस बार कम कराने की खबर के साथ ही पार्टी के भीतर खलबली मच गई है. हर नेता मोदी की सभा ज्यादा से ज्यादा कराने के लिए पार्टी के बड़े नेताओं तक अपनी बात रख रहे हैं.