राजस्थान में BJP के लिए वसुंधरा जरूरी या मजबूरी

राजस्थान में बीजेपी ने एक बार फिर वसुंधरा राजे सिंधिया के नाम पर विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है. 2013 से लेकर अब तक राजस्थान में कुल 17 उपचुनाव हुए हैं जिनमें वसुंधरा राजे को एक बार भी कामयाबी नहीं मिली. यही वजह है बीजेपी के कई नेताओं ने वसुंधरा राजे के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार कर रखा था, जिसे दरकिनार कर अमित शाह ने वसुंधरा के नाम का ऐलान किया. वसुंधरा को राजस्थान में चौथी बार सीएम चेहरे के रूप में उतारना बीजेपी के लिए मजबूरी है या जरूरी इसे इन पांच बातों से आसानी से समझा जा सकता है.

1. वसुंधरा की शक्ति के आगे झुकी बीजेपी

वसुंधरा राजे पार्टी आलाकमान को अपनी शक्ति प्रदर्शन से वाकिफ कराने में कामयाब रही हैं. दरअसल वसुंधरा की जगह किसी दूसरे चेहरे को आगे बढ़ाने पर पार्टी की टूट का बढ़ा खतरा था. राजस्थान में बीजेपी के 80 फीसदी विधायक वसुंधरा के खेमे के हैं और उनके अंधभक्त हैं. ये सभी उनके एक इशारे पर कोई भी कदम उठाने को राजी हैं. ऐसे में पार्टी आलाकमान को उनके नाम पर मुहर लगानी पड़ी. इससे पहले पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाना चाहते थे, पर वसुंधरा राजे इस पर राजी नहीं थी. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राजे को राज़ी करने के लिए सभी जतन किए, लेकिन वे टस से मस नहीं हुईं. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद संभवत: यह पहला मौका था जब इन दोनों नेताओं को पार्टी के किसी क्षेत्रीय क्षत्रप ने न केवल सीधी चुनौती दी, बल्कि घुटने टेकने पड़ गए थे. गजेंद्र सिंह की जगह मदन लाल सैनी को अध्यक्ष बनाना पड़ा था.

2. वसुंधरा के कद का दूसरा चेहरा नहीं

राजस्थान में वसुंधरा राजे का मतलब बीजेपी और बीजेपी का मतलब वसुंधरा राजे है. मौजूदा समय में राज्य में वसुंधरा के कद का बीजेपी में कोई दूसरा चेहरा नहीं है. हालांकि पार्टी में ओम माथुर, भूपेंद्र यादव जैसे कई दिग्गज नेता हैं, लेकिन इनके पास जनाधार नहीं है. इसका भी फायदा वसुंधरा के पक्ष में जाता है. इस बात को इससे भी बखूबी समझा जा सकता है कि 2008 के विधानसभा चुनाव में संघ के हाथ हटा लेने के बाद भी वसुंधरा राजे अपने दम पर 78 सीटें जीतने में कामयाब रही थीं.

3. केंद्रीय नेतृत्व को 2019 की फिक्र

बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व को राजस्थान के विधानसभा चुनाव से ज्यादा चिंता अगले साल होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव की है. ऐसे में 2019 से पहले बीजेपी वसुंधरा राजे को नाराज कर किसी तरह का कोई जोखिम भरा कदम नहीं उठाना चाहती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी राजस्थान की सभी सीटें जीतने में कामयाब रही थी. ऐसे में गिरी से गिरी हालत में बीजेपी अपनी आधी से ज्यादा सीटें बचाने में कामयाब रह सकती हैं, लेकिन वसुंधरा को नाराज करके सभी सीटों को नहीं खोना चाहती है.

4. मध्य प्रदेश कनेक्शन

वसुंधरा राजे मध्य प्रदेश के ग्वालियर के सिंधिया परिवार की बेटी हैं. शिवराज सरकार में उनकी बहन मंत्री हैं. राजस्थान के साथ ही मध्य प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. वसुंधरा की जगह किसी दूसरे चेहरे को बीजेपी आगे बढ़ाती है तो इसका असर मध्य प्रदेश में पड़ सकता है.

5. जातीय समीकरण

वसुंधरा राजे की शादी जाट समुदाय के धौलपुर राजघराने में हुई. राजस्थान में जाट समुदाय 12 फीसदी है, जो वसुंधरा के पीछे एकमुश्त खड़ा है. जाट समुदाय राजनीतिक रूप से भी राज्य में सबसे मजबूत कौम के रूप में है. इसके अलावा ओबीसी मतों को साधने की भी कोशिश की है. ओबीसी मतों के मद्देनजर पार्टी की कमान मदन लाल सैनी को दिलाई. अलग-अलग समाज के जातीय सम्मेलन कर उन्हें साधने की कोशिश में जुटी हैं.

राजस्थान में वसुंधरा का परफॉर्मेंस?

राजस्थान में 200 विधानसभा सीटें हैं, बीजेपी ने 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में वसुंधरा राजे के चेहरे पर भरोसा जताया था. 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो तिहाई से ज्यादा बहुमत मिला था. 163 सीट वसुंधरा के नेतृत्व में मिली थीं जबकि कांग्रेस सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई थी. 2008 में वसुंधरा के नेतृत्व में ही बीजेपी उतरी थी. 2008 में कांग्रेस को 96 सीट मिली थीं तो बीजेपी को सिर्फ 78 सीट मिली थी. लेकिन 2003 में वसुंधरा के नेतृत्व में बीजेपी को 120 सीट मिली थी जबकि कांग्रेस को सिर्फ 56 सीट ही मिली थी.