कद्दावर जाट नेता ने की सन्यास की घोषणा, बेटे को बनाया उत्तराधिकारी

दातारामगढ़ सीट से 6 बार के विधायक और जाट राजनीति के कद्दावर चेहरा रहे नारायणसिंह ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी की घोषणा कर अपने बेटे को विधायक बनाने के लिए लड़ाई शुरू कर दी है. खुद चुनाव न लड़कर नारायण सिंह अब अपने बेटे को टिकट दिलवाने के बाद जीत के लिए चुनावी समर में उतरेंगे. नारायण सिंह ने यह घोषणा खाटू श्यामजी के पास अलोदा गांव में आयोजित एक कार्यक्रम में की. दरअसल नारायणसिंह की पूत्रवधू और पूर्व जिला प्रमुख रीटा सिंह टिकट पाने वालों की दौड़ में हैं. उनके पुत्र और पुत्रवधु में राजनीतिक लड़ाई चल रही है. ऐसे में नारायण सिंह ने अपने समर्थकों व पार्टी को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उनके उत्तराधिकारी पूर्व प्रधान वीरेन्द्र सिंह ही होंगे.किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष नारायण सिंह की पांच दशक तक दांतारागढ विधानसभा में जमकर तूती बोलती रही है. उनको सीकर में कांग्रेस की राजनीति का भीष्म पितामाह भी कहा जाता है, क्योंकि सीकर के कद्दावर महरिया परिवार को उन्होंने ही चुनौती देते हुए पीछे छोड़ा था. ईमानदार, पार्टी और कार्यकर्ताओं को समर्पित नारायण सिंह बुरड़क दबंग व थोड़े अक्खड़ स्वभाव के माने जाते हैं.
जगजाहिर है पति-पत्नि की राजनीतिक लड़ाई
नारायण सिंह के बेटे वीरेन्द्र सिंह व उसकी पत्नि रीटा सिंह की राजनीतिक लड़ाई जगजाहिर है. बीते अगस्त माह में रीटा सिंह ने सद्भावना यात्रा का कार्यक्रम रखा था. इसकी सूचना विरेन्द्र सिंह को नहीं दी गई थी. इसके बाद वीरेन्द्र सिंह ने भी उसी दिन मेरा गौरव, मेरा बूथ कार्यक्रम रख दिया था. वहीं गत दिनों हुए कांग्रेस के कार्यक्रम में रीटा सिंह को मंच पर जगह नहीं दी गई थी. इसके बाद से ही वीरेन्द्र सिंह व रीटा सिंह के समर्थक लगातार आमने सामने हो रहे हैं. अब विरेन्द्र सिंह के राजनीतिक वारिस घोषित होने पर रीटा सिंह के समर्थक जरूर थोड़े निराश होंगे.
नहीं खोले हैं पत्ते

वहीं रीटा सिंह ने अब भी खुलकर बगावत नहीं की है. उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र में टिकट मांगने का अधिकार सबको है. टिकट का अंतिम फैसला आलाकमान ही करता है. यही बात विरेन्द्र सिंह ने भी कही है कि टिकट का अधिकार पार्टी के पास है और कांग्रेसजन मेहनत कर रहे हैं. यह सब जानते हैं कि दांतारामगढ विधानसभा में कांग्रेस की टिकट का फैसला नारायणसिंहं के अलग होकर नहीं हो सकता है. वहीं इस परिवार को लगता है कि कहीं इस लड़ाई का फायदा कोई और ना ले जाए. इसलिए अभी पत्ते खोले नहीं गए हैं.