1993 का भूत कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रहा…राहुल की टीम पर भी पड़ने लगी छाया

जयपुर . चुनावी समर में उतरी कांग्रेस के भीतर टिकटों पर मंथन जारी है. सभी सीटों पर पैनल को अंतिम रूप देकर लॉक करने में जुटे आला नेताओं के साथ ही स्क्रीनिंग कमेटी मापदंडों के भंवर जाल से बाहर निकलने लगी है. कल तक टिकटों को लेकर तय किए गए मापदंडों के पैमाने अब केवल जिताऊ पर आकर टिक गई है. बस कोई नियम बचा है तो वो है पैराशूटर उम्मीदवार का. प्रत्याशियों की घोषणा से पहले जिस तरह से मापदंडों को किनारे रखा गया है, उसमें 1993 की छाया साफ दिखाई दे रही है.
प्रत्याशियों के चयन की कवायद शुरू होने के दौरान पार्टी की तरफ से जिन मापदंडों पर बात हो रही थी. वे अब कहीं नजर नहीं आ रहे हैं. लगातार दो बार हार और 20 हजार से अधिक मतों से हारने वाले नेताओं को लेकर स्क्रीनिंग कमेटी के सुर आंतरिक रूप से बदल गए हैं. अब पार्टी के आला नेता इशारों-इशारों में केवल यही कहते हैं कि जो प्रत्याशी मैदान में जीत सकेगा, उसे उतारा जाएगा. मतलब साफ है कि पार्टी मापदंडों के जाल में फंसकर किसी भी राजनीतिक नुकसान के रिस्क को नहीं उठाना चाहती है. क्योंकि, 1993 से शुरू हुए मापदंडों की बेड़ियों में पार्टी जब-जब फंसी है, तब तब नुकसान ही उठाना पड़ा है. पार्टी के नेताओं का एक धड़ा इस मामले में साफ कहता भी है कि नियमों में फंसकर चलेंगे तो फायदा नहीं केवल नुकसान ही होगा. माना जा रहा है कि अतीत से सबक लेते हुए ही पार्टी ने नियमों को लेकर पैर पीछे खींच लिए हैं. पार्टी के जानकारों का कहना है कि सबसे पहले इस तरह के नियम 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लागू किया था. जिसके तहत 20 से अधिक नेताओं के टिकट काट दिए गए थे. इसका परिणाम यह हुआ कि करीब 20 नेताओं ने निर्दलीय चुनावी ताल ठोक दी और जीत भी गए. इस चुनाव में भाजपा को 95 और कांग्रेस को 76 सीटें मिली. बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेकर सरकार बना ली. जानकारों ने बताया कि 1998 के चुनाव में कांग्रेस ने सबक लेते हुए टिकट वितरण में मापदंडों से दूरी बनाए रखी तो 153 सीटों पर जीत दर्ज कर गए. लेकिन, 2003 के चुनाव में आते-आते कांग्रेस को फिर से मापदंड याद आ गए. जिसके बाद कइयों के टिकट काट दिए गए. इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस को 56 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. वहीं, 2008 के चुनाव में पार्टी ने उन सभी नेताओं के टिकट काट दिए, जो कि 20 हजार से अधिक वोट से हारे थे. इस चुनाव में पार्टी को 96 सीटों पर संतोष करना पड़ा. हालांकि, कांग्रेस ने बसपा के 6 विधायकों को साथ लेकर सरकार बना ली. 2013 में भी पार्टी ने इसी फॉर्मूले को अपनाया तो नतीजा 21 सीटों के रूप में सामने आया. हालांकि, इस चुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे प्रमुख वजह मोदी लहर भी रहा है.  लेकिन, पार्टी के एक धड़े का साफ मानना है कि मापदंडों के पेच में फंसने पर पार्टी को हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ा है. सूत्रों के मुताबिक 1993 में टिकट वितरण के दौरान मापदंडों के चलते हुए नुकसान की छाया इस बार प्रत्याशियों के चयन प्रक्रिया पर दिखाई देने लगी है. यही कारण है कि पार्टी आंतरिक रूप से मापदंडों से पीछे हट गई है. क्योंकि, लगातार दो बार चुनाव हारने वाले मापदंडों के दायरे में पार्टी के करीब डेढ़ दर्जन नेता आ रहे थे। जिनमें पूर्व प्रदेशाध्यक्ष चंद्रभान सिहं, बीडी कल्ला जैसे बड़े नेताओं के नाम भी शामिल हैं। ऐसे में स्क्रीनिंग कमेटी चुनावी रिस्क लिए बिना मापदंडों को भूल केवल जिताऊ को याद रखते हुए पैनल बना रही है।

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