हार के डर से वसुंधरा के 6 खास मंत्री बदलना चाहते हैं सीट

जयपुर. प्रदेश में कई दशकों से सत्ता परिवर्तन एक ट्रेंड के रूप में रहा है. एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की परिपाटी से राजनीतिक दल भी भलीभांति परिचित है. यही कारण है कि हर बार चुनावी समय आते ही सत्ताधारी दल सत्ता परिवर्तन के इस ट्रेंड को खूब कोसते हैं. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अपनी गौरव यात्रा के दौरान हर जगह इस ट्रेंड को बदलने की अपील करती नजर आयी. वहीं अमित शाह और अन्य केंद्रीय मंत्री भी अपने संबोधन में यही कहते नजर आए. यही कारण है कि प्रदेश के मंत्री और विधायकों को भी इस परिवर्तन का डर सता रहा है. कई मंत्री भी इसी कारण अपनी सीट बदलना चाहते है ताकि नए क्षेत्र से चुनाव लड़ नए समीकरणों के माध्यम से चुनाव में जीत सके. यह पहला मौका नहीं जब विधायक और बड़े नेता सीट बदल रहे हो. ऐसा हर बार देखने को मिला कि कई नेता अपनी सीट बदलते है, लेकिन पहले नेता पार्टी की मजबूती के लिए सीट बदलते थे और आज खुद की विधायिकी बचाने के लिए सीट बदलते हैं. पुराने नेताओं में स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत की पहचान सीट बदलकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं में थी.

शेखावत ने पार्टी की मजबूती के लिए बदली हर बार सीट

राजनीति के इतिहास में बड़े नेताओं का सीट बदलने का सिलसिला भारत की आजादी के समय से ही चला आ रहा है. पहले लोकतंत्र की मजबूती लोकप्रिय नेता सीट बदल कर चुनाव लड़ते थे. उसके बाद एक दौर वो आया जब अपनी पार्टी को मजबूती दिलाने और पार्टी के कमजोर क्षेत्र से बड़े नेता चुनाव लड़कर वहां से पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए चुनाव में सीटें बदलकर चुनाव लड़ने लगे. राजस्थान में भाजपा को आज 1 से 163 तक पहुंचाने में किसी नेता का योगदान है तो वो है भैरोंसिंह शेखावत. शेखावत ने अपनी राजनीति में कई स्थानों से चुनाव लड़ा लेकिन उस समय जगह बदल कर चुनाव इसलिए लड़ा जिससे कांग्रेस के गढ़ में भाजपा का कमल खिलाया जा सके. शेखावत ने प्रदेश के हर क्षेत्र से चुनाव लड़ प्रदेश के हर क्षेत्र में भाजपा की नींव रखी उसी की बदौलत है कि आज भाजपा प्रदेश ने इतना बड़ा जनाधार बना सकी है. शेखावत अपने 10 बार के विधायक कार्यकाल में 8 बार अलग अलग सीटों से लड़े और जीते और तीन सीटों से वो हारे भी लेकिन पार्टी को मजबूती जरूर दिलाई लेकिन वो दौर दूसरा था.

राजेन्द्र राठौड़

राजस्थान सरकार में मंत्री राजेंद्र राठौड़ 6 बार विधायक रह चुके है. 1990,1993,1998 और 2003 चार बार लगातार चुरू से विधायक बने लेकिन 2008 में राठौड़ ने चुरू की बजाए तारानगर से चुनाव लड़ा और जीते लेकिन चुरू में भाजपा चुनाव हार गई. उसके बाद 2013 में फिर से राठौड़ ने चूरू से चुनाव लड़ा और अभी सरकार में मंत्री है. कहीं ना कहीं सीट बदल कर राठौड़ तो तारानगर से जीत गए लेकिन चुरू में भाजपा हारी. अब राठौड़ की निगाहें जयपुर की विद्याधर नगर सीट पर केंद्रित है.

प्रभुलाल सैनी

राज्य सरकार में कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी ने अपना पहला चुनाव 2003 में अपने गृह क्षेत्र उनियारा विधानसभा से लड़ और चुनाव जीत उस समय भी कृषि मंत्री बने उसके बाद 2008 में हिंडोली से सैनी ने चुनाव लड़ा. सैनी तो हिंडोली से जीत गए लेकिन 2008 में देवली-उनियारा सीट से भाजपा चुनाव हार गई. वहीं 2013 में सैनी अपने क्षेत्र से 150 किलोमीटर दूर अंता से चुनाव लड़े सीट काफी टफ थी सामने कांग्रेस के मजबूत नेता प्रमोद जैन भाया थे लेकिन फिर भी सैनी यहां से चुनाव जीते. इस बार भी सैनी सीट बदलने की फिराक में है,और उनकी निगाह देवली उनियारा पर टिकी है.

यूनुस खान

सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री यूनुस खान भी इस बार दूसरी सीट से भाग्य आजमाना चाहते है क्योंकि सत्ता परिवर्तन की परिपाटी की वजह से 2008 में उन्हें चुनाव में हार मिली थी. 1998 में डीडवाना से पहला चुनाव खान ने लड़ा था जिसमें उन्हें हार मिली. 2003 में जीते मंत्री बने. 2008 में फिर हार का सामना करना पड़ा और 2013 में फिर जीते. अब खान सीट बदल कर हार से बचना चाहते हैं. जयपुर की आदर्श नगर सीट पर उनकी नजर भी है. हालांकि मीडिया के समक्ष वो डीडवाना सीट से ही चुनाव लड़ने की बात कहते हैं.

श्रीचंद कृपलानी

सरकार में नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी भी इस बार सीट बदलकर चुनाव लड़ने की फिराक में है कृपलानी की निगाहें जयपुर के सांगानेर सीट पर केंद्रित है. सांगानेर में सिंधी वोटर्स ज्यादा है और कृपलानी भी सिंधी समाज से ही आते हैं. साथ ही सांगानेर की सीट भाजपा के लिए फिलहाल खाली ही है क्योंकि घनश्याम तिवाड़ी ने भाजपा से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली है. लिहाजा कृपलानी कि निगाहें इस सीट पर टिकी हैं.

जसवंत यादव

श्रम मंत्री जसवंत यादव भी की भी इस बार बहरोड़ से चुनाव लड़ने की इच्छा कम है हाल ही में मिली लोकसभा उपचुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था यहां तक कि बहरोड़ विधानसभा में भी उन्हें वोट हासिल नही हो सके थे. जसवंत यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुवात कांग्रेस से की और 1985 से 1998 तक कई चुनाव लड़े लेकिन किसी मे जीत नही मिल सकी. अलवर से 1999 में बीजेपी से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने उसके बाद 2008 और 2013 में बहरोड़ से विधायक है. लेकिन इस बार उन्हें फिर हार का डर सताने लगा है. इसलिए उन्होंने चुनाव ना लड़ने की मंशा जताते हुए अपने बेटे का नाम आगे कर दिया है.

अरुण चतुर्वेदी

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी फिलहाल जयपुर की सिविल लाइन्स विधानसभा सीट से विधायक है लेकिन सूत्रों की माने वो भी सीट बदलने की कोशिशों में हैं. वो भरतपुर और जयपुर की एक अन्य सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं. हालांकि चतुर्वेदी कहते है कि पार्टी जहां भी उन्हें टिकट देगी वहीं से वो चुनाव लड़ेंगे. इनके अलावा भी भाजपा ने कई मंत्री है जो विकल्प की तलाश में हैं. खाद्य मंत्री बाबूलाल वर्मा केशोरायपाटन से इस बार चुनाव नही लड़ना चाहते है जीएडी मंत्री हेम सिंह भड़ाना भी मैदान छोड़ने की फिराक में है. साथ ही कई बड़े नाम है जो अपने क्षेत्र बदल कर हार से बचना चाहते है. लेकिन फिलहाल आलाकमान से सीटें बदलने की अनुमति के संकेत नही मिलने से यह तमाम नेता पशोपेश में है. आपको बता दें कि राजस्थान चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर पहले ही साफ कर चुके हैं कि वो किसी भी मंत्री को सीट बदलने नहीं देंगे.