बीरबल की खिचड़ी बनी कांग्रेस की पहली लिस्ट….ये हैं 5 प्रमुख कारण

दशहरे से पहले हलचल थी कि कांग्रेस सबसे पहले दाव खेलेगी और भाजपा से पहले अपनी सूची निकाल देगी. लेकिन कांग्रेस की सूची अभी तक लटकी हुई है. इस काम में हो रही लेटलतीफी को कुछ लोग स्ट्रेटजी प्लान भी मानकर चल रहे हैं. लेकिन असल में प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने में हो रही देरी के पीछे कुछ फैक्टर हैं जिनकी वजह से यह इंतजार और भी बढ़ गया है. ये हैं वो संबावित कारण जो आड़े आ रहे हैं…..
No-1-पायलट-डू़डी की 19 सीटों को लेकर खींचतान
टिकट को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान जारी है. सूत्रों की मानें तो मंगलवार को हुई सीईसी की बैठक में सचिन पायलट और रामेश्वर डूडी के बीच कुछ सीटों को लेकर विवाद हो गया था. इसके चलते बुधवार को कांग्रेस आलाकमान ने 19 विवादित सीटों पर चार सदस्यों की कमेटी गठित कर दी है. अब यह कमेटी इन विवादित सीटों का निपटारा करेगी.
सूत्रों के अनुसार कमेटी को जो विवादित सीटों के नाम सौंपे गए हैं उनमें जयपुर ग्रामीण से फुलेरा, विराटनगर और शाहपुरा शहर क्षेत्र से झोटवाड़ा सीट, हनुमानगढ़ जिले की दो नोहर और संगरिया, जोधपुर की तीन ओसियां, लूनी और फलौदी, बीकानेर पूर्व, पाली की जैतारण सीट, गंगानगर की सूरतगढ़, नागौर और लाडनूं, भरतपुर जिले से नदबई सीट, टोंक जिले से देवली और उनियारा, जैसलमेर सीट, चूरू जिले से रतनगढ़ सीट पर विवाद है.
No-2 गहलोत-पायलट के अपने-अपने लोगों को फिट कराने की कवायद
राजस्थान में हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन होता आया है. इस वजह से कांग्रेस पहले से आश्वस्त है कि जीत उसी की है. ऐसे चुनावी माहोल में जब भाजपा के सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है कांग्रेस के पास दावेदारों की भी लंबी चौड़ी सूची है…जिसको लेकर न जाने कितनी बार विवाद हो चुका है. वहीं एक तरफ सचिन पायलट अपने चहेतों के लिए राहुल गांधी के समक्ष पैरवी कर रहे हैं दूसरी तरफ अशोक गहलोत जो कि टिकट बांटने वाली कमेटी में महत्ती भूमिका निभा रहे हैं, दोनों के बीच अपने-अपने चहेते चेहरों को फिट करने को लेकर घमासान जारी है. यह घमासान प्रत्यक्ष रूप से भी है और अप्रत्यक्ष रूप से भी. पिछले दिनों दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय से लेकर वार रूम तक विरोध प्रदर्शन हुए वह सब इसी खींचतान की बदौलत है.
No-3 राहुल का युवा और महिला का फार्मूला…जीताऊ के आड़े आता हुआ
कांग्रेस अध्यक्ष राजस्थान में नए फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं और युवा उम्मीदवारों को मैदान में उतार सत्ता में आने की कवायद कर रहे हैं. जबकि सचिन पायलट से लेकर अशोक गहलोत इस फैसले के विरोध में खड़े हैं. संकट इस बात का भी है कि कांग्रेस मैदान में सिर्फ जिताउ उम्मीदवार पर ही दाव खेलना चाह रही है और दावेदारों की एक लम्बी भीड़ है. कांग्रेस के लिए यह तय कर पाना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है कि किस पर दांव खेला जाए और किस पर नहीं. किसी पुराने या कद्दावर नेता का टिकट काट नए को सामने लाया जाता है तो बहुत ही कम समय में पार्टी नेतृत्व के सामने इतने बागी तम्बू तानकर खड़े हो जाएंगे जिनको संभालना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में बहुत ही सोच समझकर बार-बार टिकटों पर मंथन किया जा रहा है. नाम फाइनल करने में एक तरफ पिछले चार साल से राजस्थान की जमीन पर काम कर रहे सचिन पायलट हैं तो दूसरी तरफ राहुल के चाणक्य कहे जाने वाले अशोक गहलोत जो प्रदेश की हर सियासी हलचल से वाकिफ हैं. यह खींचतान भी देरी का प्रमुख कारण बन रही है.
No-4 राहुल की राजस्थान में नई पौध तैयार करने का सपना
युवा राहुल गांधी एक सपना संजोकर बैठे हैं कि वे राजस्थान से नए नेताओं की एक फौज तैयार करें जो भविष्य में चलकर राजस्थान ही नहीं देश की सियासत में बड़ा कद बनकर उभरे. ऐसे में वे राजस्थान के चुनावी रण में नए, उर्जावान युवाओं को मौका देना चाहते हैं. राजस्थान में प्रत्याशियों की सूची को लेकर राहुल गांधी अधिकांश लोगों से सीधे मिल चुके हैं. उनकी यह कोशिश है कि राजस्थान के हर नेता उनतक पहुंचे और उनका हाथ प्रदेश की सियासत में हमेशा बना रहे. इस कवायद में राजस्थान की जमीन पुराने समय से जमे हुए नेताओं को वे बाहर कर देना चाहते हैं और उनकी जगह नई पौध जिसे वो तैयार करने का सपना लिए हुए हैं, उन्हें मौका देना चाहते हैं. इस कवायद में महिलाओं की भागीदारी को लेकर भी उनका रुख कुछ ऐसा ही है. राजस्थान से कई महिला चेहरे भी राहुल गांधी अपनी सूची में चाह रहे हैं.
No-5 भाजपा का 30 जाटों को टिकट देना
भाजपा ने अपने 131 प्रत्याशियों की सूची 30 जाट नेताओं को टिकट दिया है…कांग्रेस को इस सूची का इंतजार भी था. इस सूची के आते ही सबसे पहले लिस्ट बनाने में जुटी कांग्रेस के सारे जोड़-तोड़ बिगाड़कर रख दिए हैं. जाटों को इतना प्रतिनिधित्व देना कांग्रेस को हैरान कर देने वाला है. भाजपा के जाट कार्ड के तोड़ में अब कांग्रेस इस कवायद में जुटी है कि वो इनके आगे मूल ओबीसी के नेताओं को मौका दे या फिर अपने पुराने जोड़-तोड़ के सहारे सत्ता में आने की कोशिश करे.