मानवेन्द्रजी को भी मालूम है….जाट-राजपूत नहीं….मुस्लिम-दलित जिसका….मारवाड़ उसका

शिव, जहां से मानवेंद्र खुद विधायक हैं, ये एक  मुस्लिम-राजपूत वर्चस्व वाली सीट है. बाड़मेर सीट पर पूरी तरह से पर जाटों का प्रभुत्व है, जिसे कांग्रेस पार्टी के एक जैन ने जाट विरोधी भावनाओं के चलते अपना गढ़ बना लिया है. बायतु स्पष्ट रूप से जाट वर्चस्व वाली सीट है, पचपदरा ओबीसी है, गुडामालानी कलबी-जाट है और चोहटन में सिंधी मुसलमानों का दबदबा है. जैसलमेर और पोकरण विधानसभा सीट पर राजपूत-मुस्लिम वर्चस्व की लड़ाई में उलझे हैं वहीं सीमा पार पाकिस्तान के विभिन्न धार्मिक स्थल भी इलाके की राजनीति पर सीधा प्रभाव रखते है. जसवंत सिंह ने जब चुनाव लड़ा था तो ऐसी स्थिति में मुस्लिम-दलित-राजपूत कॉम्बिनेशन में ही वो 4 लाख से ज्यादा वोट लेने में कामयाब हुए थे लेकिन मानवेन्द्र को बाड़मेर की राजनीति में जसवंत के बेटे की तरह ही पहचाना जाता है. जसवंत जब अस्वस्थ है ऐसे में जसवंत सिंह के बिना मानवेन्द्र किस तरह से खुद की विरासत को बचा सकेंगे ये देखने की बात होगी.
मानवेन्द्र सिंह विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि वर्तमान से वो जिस शिव सीट से विधायक है, वो कांग्रेस की  परम्परागत तौर पर मुस्लिम सीट है. इसके बाद बाड़मेर में मानवेन्द्र या उनकी पत्नी के पास विधानसभा की सीट के तौर पर केवल सिवाना सीट बचती है. जहां से कहा जा रहा है कि मानवेन्द्र की पत्नी चित्रा सिंह चुनावी समर में उतर सकती हैं.
वही ये भी कहा जा रहा है कि मानवेन्द्र ने कांग्रेस से दो विधानसभा सीट जैसलमेर और पोकरण मांगी है जैसलमेर जहां राजपूत प्रभाव वाली सीट है तो वहीं पोकरण में मुस्लिम राजपूत में मुकाबला होता रहा है. मुस्लिम कांग्रेस का कोर वोट है ऐसे में कांग्रेस मुस्लिमों को नाराज नहीं कर सकती है. लेकिन कहा जा रहा है कि मानवेन्द्र पोकरण से गाजी फकीर के परिवार को किसी पड़ोस की सीट पर शिफ्ट होने के लिए मना रहे हैं ताकी जैसलमेर और पोकरण सीट पर मानवेन्द्र का ही हस्तक्षेप हो जाये और जिसे मानवेन्द्र चाहे उसे इन सीटों पर जीता सके. अगर गाजी फकीर का परिवार इसके लिए राजी नहीं होता है तो फिर मानवेन्द्र के सामने मुसीबत और बढ़ जायेगी क्योंकि इस कॉम्बिनेशन के बिना ना तो मानवेन्द्र विधानसभा में किसी सीट पर जीत सकतें है ना ही लोकसभा चुनावों में.