‘र’ से राजनीति और ‘र’ से राजपूत…बदलता रहा है इतिहास

पार्टी छोड़कर अलग होने वालों में अकेला जसवंत सिंह जसोल का परिवार ही नहीं है. ऐसे कई कद्दावर राजपूत नेता रहे हैं जिन्होने किसी ना किसी नाराजगी के चलते दूसरी पार्टी का दामन थामा हो. कोई कांग्रेस में गया तो किसी ने भाजपा की सदस्यता ली. इन नेताओं में ज्यादातर तो राजस्थान के पूर्व राजघरानों के लोग हैं जो राजनीति में भी सक्रिय रहे.
1. राव राजेन्द्र- राव धीर सिंह

जयपुर के विराट नगर से लगातार विधायक बन रहे राव राजेन्द्र की गिनती भाजपा के दिग्गज नेताओ में होती है. वे वर्तमान में भाजपा से तीसरी बार विधायक बने हैं और वसुन्धरा राजे ने उन्हे विधानसभा उपाध्यक्ष बनाया है. लेकिन आपकों बता दें राव राजेन्द्र के पिता राव धीर सिंह 1967 में कांग्रेस के विधायक थे. राव राजेन्द्र के पिता स्वर्गीय राव धीर सिंह बैराठ विधानसभा कांग्रेस से विधायक बने थे. 1972 के चुनावों में हारने के बाद साल 1974 में राव धीर सिंह का निधन हो गया. जिसके बाद कांग्रेस ने इस परिवार का टिकट काट दिया. यही नाराजगी रही कि ये परिवार कांग्रेस से दूर हो गया. इसके बाद राव धीर सिंह की पत्नी और राव राजेन्द्र की मां गुणवंत कुमारी ने जनता पार्टी का दामन थाम लिया और 1977 में जनता पार्टी के भाजपा में विलय होने के बाद अब ये परिवार पूरी तरह से कांग्रेस से दूर और भाजपा के साथ है. साल 1998 में भाजपा के टिकट से ही राव राजेन्द्र सिंह ने चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. जिसके बाद लगातार तीन बार 2003, 2008 और 2013 में बीजेपी से विधायक बनें.
2012. लोकेन्द्र सिंह कालवी-कल्याण  सिंह कालवी
राजपूतों की राजनीति में नागौर के नेता कल्याण सिंह कालवी का बड़ा नाम है. नागौर की राजनीति में उन्हे महारत हासिल थी. साल 1985 में कल्याण सिंह कालवी डेगाना से जनता पार्टी के विधायक जीते और भैरो सिंह सरकार में कृषि मंत्री बनाए गए. जनता पार्टी का भाजपा में हुआ तो कल्याण सिंह जनता दल में शामिल हो गये और बाडमेर लोकसभा से साल 1989 में सांसद बने. उनके बेटे लोकेन्द्र कालवी ने भी शुरूआत में भाजपा का दामन थामा और1998 में भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बाद लोकेन्द्र सिंह ने भाजपा छोड़ी और कांग्रेस में चले गये, वहां भी बात नहीं बनी तो वो बसपा मे शामिल हुए. अब लोकेन्द्र सिंह पूरी तरह से राजपूत समाज की राजनिती कर रहें हैं, लोकेन्द्र कालवी ने अब करणी सेना के संयोजक है.

3. महेन्द्र कुमारी- भंवर जितेन्द्र

राजस्थान कांग्रेस में आज के समय सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार भंवर जितेन्द्र सिंह का परिवार भी लम्बे समय तक भाजपा के साथ रहा था. उनकी मां महेन्द्र कुमारी भाजपा से सांसद बनीं. लेकिन जब उनकी अचानक भाजपा से पटरी नहीं बैठी तो निर्दलीय चुनावों में उतर गयी. साल 1998 के आम चुनावों मे महेन्द्र कुमारी ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. अलवर राजघराने का ये परिवार कांग्रेस के इतना करीब आ गया कि महेन्द्र कुमारी के बाद उनके बेटे भंवर जितेन्द्र को अलवर से विधानसभा टिकट दिया. भंवर जितेन्द्र पहले साल 1998 और फिर 2003 में लगातार दो बार अलवर से विधायक बने. साल 2009 में भंवर जितेन्द्र को कांग्रेस ने लोकसभा का चुनाव लडाया और जीतने के बाद केन्द्र में मंत्री पद भी दिया. केन्द्र से सत्ताहीन हुई कांग्रेस में आज भी भंवर जितेन्द्र सिंह अहम पद पर हैं.

4. भवानी सिंह-दिया कुमारी

जयपुर राज परिवार के पूर्व महाराज भवानी सिंह ने सियासी पारी की शुरूआत कांग्रेस से की. भवानी सिंह को कांग्रेस ने 1989 में जयपुर लोकसभा से टिकट भी दिया, लेकिन वो चुनाव हार गये. इस हार के बाद भवानी सिंह ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली. लेकिन साल 2013 में राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले भवानी सिंह के बेटी राजकुमारी दिया कुमारी भाजपा शामिल हुई और सवाईमाधोपुर सीट से टिकट हासिल कर चुनाव जीता.

5. भैरों सिंह-प्रताप सिंह खाचरियावास

राजस्थान की सियासत में खाचरियावास के शेखावत परिवार का नाम सबसे पहले आता है. भाजपा के संस्थापक सदस्यों में रहे दिवंगत उपराष्ट्रपति भैंरोसिंह शेखावत को राजस्थान की सियासत का भीष्म पितामाह माना जाता है. उनके जवांई तो भाजपा से विधायक हैं लेकिन उनके भतीजे प्रताप सिंह खाचरियावास कांग्रेस में राजनीति कर रहें है. छात्र राजनीति से उठे प्रताप सिंह को कांग्रेस ने 2004 में लोकसभा तो 2008 और 2013 में विधानसभा चुनाव लडवाया.  हालांकी उन्हे जीत साल 2008 में पहली बार मिली. 2013 में वो चुनाव हार गए. लेकिन प्रताप सिंह खाचरियावास राजस्थान कांग्रेस के फायरब्रांड नेता माने जाते हैं और अहम पद पर भी हैं.

6. दिग्विजस सिंह उनियारा

दिग्विजय सिंह उनियारा भी भैरो सिंह सरकार में मंत्री रहे. सियासी शुरूआत पहले स्वतंत्रता पार्टी की टिकट से 1962 में की. इसके बाद जनता पार्टी की टिकट पर 1967 और 1977 में विधायक बनें. जनता पार्टी जब भाजपा में समाहित हुई तो दिग्विजय सिंह जनता दल में शामिल हो गये. विधानसभा चुनाव 1990 में जनता दल की टिकट पर विधायक बनें. भैरों सिंह शेखावत की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे. लेकिन बाद में भाजपा को छोड कांग्रेस का दामन थाम लिया और कांग्रेस की टिकट पर 1998 में जीत हासिल की. हालांकी वो 2003 में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव हार गये.

7. लक्ष्मण सिंह-हर्षवर्धन सिंह डूंगरपुर राजपरिवार

लक्ष्मण सिंह राजस्थान विधानसभा में सबसे लम्बे समय तक नेता प्रतिपक्ष रहे. जिस कांग्रेस की खिलाफत कि उसी पार्टी के टिकट से 1985 में विधायक बनें. उसी कांग्रेस ने लक्ष्मण सिंह को राजस्थान विधानसभा में स्पीकर भी बनाया. कई दशकों तक यह परिवार कांग्रेस से सियासत करता रहा लेकिन वर्तमान में उनके परिवार के सदस्य हर्षवर्धन सिंह डूंगरपुर भाजपा के पाले में हैं. हर्षवर्धन फिलहाल भाजपा की टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं.

8. महाराणा महेन्द्र सिंह मेवाड़

महाराणा महेन्द्र सिंह मेवाड भाजपा से जुडे रहे. साल 1989 में वो भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़े और लोकसभा पहुंचे. लेकिन 1991 में भाजपा ने महेन्द्र सिंह का टिकट काट दिया और जसवंत सिंह जसोल को दे दिया. इससे नाराज होकर महेन्द्र सिंह मेवाड़ कांग्रेस में शामिल हो गये और कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गये. फिल्हाल अब महेन्द्र सिंह मेवाड किसी पार्टी से नहीं जुडे हैं.
9. इज्यराज सिंह-बृजराज सिंह कोटा
कोटा राजपरिवार के पूर्व महाराज बृजराज सिंह ने सियासी पारी कांग्रेस के साथ शुरू की थी. लेकिन साल 1967 में बृजराज सिह कांग्रेस छोड़ भारतीय जनसंघ में शामिल हो गये. दो बार वो जनसंघ से सांसद रहे. लेकिन बृजराज सिंह के बाद उनके बेटे इज्यराज सिंह ने अपना सियासी सफर कांग्रेस के साथ शुरू किया. कांग्रेस की टिकट पर इज्यराज सिंह साल 2009 में कोटा के सांसद भी बनें, हालांकी 2013 में वो चुनाव हार गये लेकिन अब कोटा का राजपरिवार पूरी तरह से कांग्रेस के साथ है.

10. गजेन्द्र सिंह खींवसर-ओंकार सिंह खींवसर

मौजूदा वसुंधरा राजे सरकार में कैबिनेट मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर से हर कोई परिचित है. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि खींवसर परिवार एक अरसे तक कांग्रेस से जुड़ा रहा. गजेन्द्र सिंह खीवसर के पिता ओंकार सिंह खींवसर राजस्थान कांग्रेस में महासचिव और उपाध्यक्ष भी रहे. उन्होने कांग्रेस की सीट से चुनाव भी लड़ा लेकिन जीत नहीं मिली. बाद में ओंकार सिंह के बेटे गजेन्द्र सिंह भाजपा में शामिल हो गये. गजेन्द्र सिंह को भाजपा की टिकट पर 2003 में नागौर, 2008 और 2013 में लोहावट से विधायक बने और वसुन्धरा राजे के दोनों कार्यकाल में मंत्री पद मिला.

11. गोपाल सिंह भादराजून

जालोर के पूर्व राजपरिवार के गोपाल सिंह भादराजून शुरूआत में जनता पार्टी की टिकट पर आहोर के विधायक बने. राजस्थान विधानसभा में स्पीकर भी रहे लेकिन बाद में उन्होने जनता पार्टी छोड कांग्रेस का दामन थाम लिया. आहोर की सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने.

12. गज सिंह जोधपुर-चंद्रेश कुमारी
जोधपुर के पूर्व महाराज हनवंत सिंह ने पहला आम चुनाव लडा लेकिन चुनावों के नतीजो से पहले ही प्लेन क्रेश में उनका निधन हो गया. इसके बाद जोधपुर की पूर्व राजमाता कृष्णा कुमारी ने निर्दलीय चुनाव जीता. पूर्व महाराजा गज सिहं भी निर्दलीय ही राज्यसभा पहुचें. पूर्व महाराज गज सिंह की बहन चंद्रेश कुमारी कांग्रेस की टिकट से 2009 में लोकसभा पहुंची. जिन्हे केन्द्रीय मंत्री भी बनाया गया. हालांकी बीता चुनाव चंद्रेश कुमारी हार गई.