राजस्थान में राहुल नई फसल रोपने की तैयारी में

जयपुर . चुनाव के मैदान में सत्ता की जंग लड़ रही कांग्रेस के भीतर प्रत्याशियों के चयन को लेकर महामंथन का दौर जारी है. कांग्रेस के वार रूम 15 जीआरजी पर प्रदेश के आला नेता और स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरमैन पार्टी हाईकमान के निर्देशों को पैनल की शक्ल देने में जुटे हैं. जिसमें युवा और महिला मुख्य हैं. पैनल को अंतिम रूप देने के लिए चल रही घंटों बैठक के दौरान राहुल के जिस नियम पर काम चल रहा है, उससे भविष्य की राजनीतिक जमीन पर नई पौध तैयार होती भी दिखाई दे रही है. जिसका असर राजस्थान की राजनीति पर गहरे रूप में पड़ने की संभावना भी प्रबल होती जा रही है.
दिल्ली में पिछले कई दिनों से पार्टी के प्रत्याशियों के चयन को लेकर जारी मंथन में राहुल की मंशा के अनुरूप तैयार हो रहे पैनल में युवा और महिला को तरजीह देने के लिए विशेष फॉर्मूला बनाया गया है. इसी फार्मूले के तहत हर पैनल में वरिष्ठ नेताओं के साथ ही युवा और महिला दावेदार का नाम भी शामिल किया जा रहा है. इस कवायद के बाद माना जा रहा है कि इस बार करीब 40 से अधिक सीटों पर दोनों वर्ग को टिकट मिल सकता है. इसके संकेत मिलने के साथ ही पार्टी के भीतर राजनीतिक पारा चढ़ गया है. क्योंकि राहुल के ये नियम कइयों के चाहने वालों की मंशा पर भारी पड़ सकता है. माना जा रहा है कि राहुल पार्टी को आंतरिक रूप से मजबूत बनाने और नई सोच में तब्दील करने के लिए युवा के रूप में नई पौध रौपना चाह रहे हैं. यही वजह है कि टिकट वितरण को लेकर जारी कवायद में उन्होंने कमेटी को खुद की तरफ से दिए गाइड लाइन के आधार पर पैनल बनाने को कहा है.
वहीं, जानकारों का कहना है कि राहुल नेताओं के आपसी झगड़े से बचने के लिए ही नए फॉर्मूले पर चल रहे हैं. जिसमें ऐसे प्रत्याशी को मैदान में उतारना चाह रहे हैं, जिसको लेकर विरोध की स्थिति नहीं बने और अगर बने भी तो उससे पार्टी का नुकसान नहीं हो. इसकी झलक मध्यप्रदेश में देखने को मिला है. मध्यप्रदेश में टिकटों के वितरण के दौरान ज्योतिदाराव सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह किसी की नहीं चली. यहां पार्टी की तरफ से घोषित किए उम्मीदवारों का आधार केवल राहुल का फॉर्मूला ही बना.  एमपी की सफलता के बाद माना जा रहा है कि राजस्थान के टिकट वितरण में भी राहुल इसी फॉर्मूले को अपनाएंगे. यहां की राजनीतिक स्थितियां भी राहुल की मंशा के अनुरूप हैं. राजनीति के जानकारों का कहना है कि तमाम सर्वे और ओपीनियन पोल में कांग्रेस को मिली बढ़त को देख राहुल राजनीतिक जमीन पर नई पौध को रौपने के मौके के गंवाना नहीं चाहते हैं. ऐसा करके प्रदेश के दिग्गज नेता अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बीच जारी प्रत्याशियों की आपसी खींचतान के भंवर से भी निकलना चाहते हैं. साथ ही हर सीट पर दावेदारों की लंबी भीड़ के बीच 1993 की स्थिति से भी बचना चाह रहे हैं. आपको बता दें कि 1993 के चुनाव में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को टिकट नहीं मिलने पर वे निर्दलीय मैदान में कूद गए थे. जिसके बाद पार्टी अच्छी स्थिति होने के बाद भी सरकार नहीं बना पाई थी. राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस स्थिति से बचने के लिए ही राहुल नए चेहरे को आगे करना चाह रहे हैं, जिसको लेकर कोई विरोध नहीं कर सके. साथ ही कई राजनीतिक समीकरण  भी इसके जरिए साधे जा सकें. उनका कहना है कि नई राजनीतिक पौध के जरिए राहुल जहां पार्टी के भीतर के बिगड़े समीकरण को पटरी पर लाना चाह रहे हैं. वहीं, युवा और महिलाओं की सहानुभूति भी पार्टी की तरफ मोड़ना चाहते हैं.