राजनीतिक चौसर पर कौनसी चाल चलेंगे जसोल के बेटे मानवेन्द्र

जोधपुर। कभी भाजपा के कद्दावर नेता रहे जसवंत सिंह जसोल के बेटे मानवेन्द्र सिंह अब राजनीतिक चौसर पर कौनसी चाल चलेंगे? सभी की निगाहें उन पर लगी है। मानवेन्द्र कांग्रेस का दामन थामेंगे या फिर राजपूत समुदाय को एकजुट कर भाजपा पर दबाव बनाएंगे? इसका खुलासा तो पचपदरा में 22 सितम्बर को प्रस्तावित स्वाभिमान रैली में ही होगा। फिलहाल कयास का दौर जारी है और मानवेन्द्र चुप्पी साध अपने स्वाभिमान को बरकरार रखने के लिए जी जान से जुटे है। जसोल परिवार को शुरू से ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ 36 का आंकड़ा रहा है। मानवेन्द्र की मां शीतल कंवर वसुंधरा राजे के खिलाफ पुलिस केस भी दर्ज करा चुकी है। गत लोकसभा चुनाव को अपना अंतिम चुनाव बताते हुए जसवंत सिंह ने बाड़मेर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। लेकिन वसुंधरा राजे ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाते हुए उनका टिकट ही कटवा दिया। इसके बाद जसवंत निर्दलीय मैदान में उतरे और वसुंधरा राजे की पसंद के उम्मीदवार कर्नल सोनाराम से हार बैठे। गत लोकसभा चुनाव में पार्टी को दरकिनार कर अपने पिता जसवंत सिंह का चुनाव प्रचार करने के लिए भाजपा ने बाड़मेर जिले के शिव से पार्टी के विधायक मानवेन्द्र को निलम्बित कर दिया। साढ़े चार साल भी पार्टी ने उनका निलम्बन वापस नहीं लिया है। जसवंत के बीमार पड़ने पर उनसे मिलने गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मानवेन्द्र को उनकी सम्मानजनक वापसी का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में वे भी उन्हें भूला बैठे। इसके बाद पार्टी ने भी कभी उनकी सुध नहीं ली। प्रदेश के राजपूत समाज पर जसवंत सिंह की बरसों तक मजबूत पकड़ रही है। समाज ने गत चुनाव में जसवंत का खुलकर साथ दिया। जसवंत के मुद्दे पर राजपूत समाज में आज भी भाजपा के प्रति नाराजगी है। इसी नाराजगी को भुनाते हुए मानवेन्द्र 22 सितम्बर को पचपदरा में स्वाभिमान रैली का आयोजन करने जा रहे है। इस रैली की सफलता के लिए मानवेन्द्र व उनकी पत्नी चित्रा सिंह दिन-रात जुटे हुए है। वे गांव-गांव जाकर समाज के लोगों से सहयोग मांग रहे है। इस रैली में भारी भीड़ जुटा कर वे भाजपा को अपनी ताकत का अहसास कराएंगे। प्रदेश में भाजपा का परम्परागत वोट बैंक रहा राजपूत समाज इन दिनों नाराज चल रहा है। कई मुद्दों को लेकर समाज की भाजपा से नाराजगी है। भाजपा ने राजपूतों की नाराजगी दूर करने को पूरा जोर लगा रखा है। ऐसे में पार्टी भी नहीं चाहेगी कि मानवेन्द्र के पाला बदलने से यह नाराजगी और बढ़े। मानवेन्द्र के लिए कांग्रेस में प्रवेश की राह भी आसान नहीं है। बाड़मेर में कांग्रेस की राजनीति हमेशा से जाट केन्द्रित रही है। ऐसे में राजपूत समुदाय के मानवेन्द्र को तव्वजो दे कांग्रेस जाटों को नाराज करना नहीं चाहेगी। यही कारण है कि चार दिन पूर्व पचपदरा में कांग्रेस की संकल्प रैली में बाड़मेर-जैसलमेर को पूर्व सांसद और कांग्रेस राष्ट्रीय सचिव हरीश चौधरी ने खुलेआम तंज कसा था कि यह मूंछ(स्वाभिमान) की लड़ाई नहीं है। न ही पार्टी में पैराशूट नेताओं की दरकार है। उनका सीधा इशारा मानवेन्द्र पर था। एेसा कह उन्होंने एक तरह से साफ कर दिया कि मानवेन्द्र के लिए कांग्रेस में प्रवेश करना आसान नहीं होगा। हरीश को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का करीबी माना जाता है। पूरे मसले पर मानवेन्द्र ने चुप्पी साध रखी है। उनका कहना है कि 22 सितम्बर को स्वाभिमान रैली में अपने समर्थकों की सलाह के आधार पर अगला कदम घोषित किया जाएगा। वहीं उनकी पत्नी चित्रा खुलकर भाजपा के खिलाफ बोल राजपूत समाज को एकजुट कर रही है।

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