वसुंधरा सरकार के इस फैसले से शिक्षक नाराज, कहा- नहीं देंगे बीजेपी को वोट

बता दें कि साल 2015 में शिक्षा राज्य मंत्री ने आरटीई नोम्स का हवाला देते हुए प्रदेश के सरकारी स्कूलों में भी सीबीएसई पैटर्न लागू किया था. जिसके तहत स्कूलों का समय बढ़ाकर साढ़े छह घंटे कर दिया गया है. उस वक्त शिक्षा राज्य मंत्री ने तर्क दिया था कि छात्र स्कूलों में यदि अधिक समय रहेंगे तो इससे शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार आएगा.
सरकार के इस फैसले पर तब शिक्षक संगठनों ने आपत्ति जताई थी. बावजूद इसके तीन साल तक ये नियम लागू रहा, लेकिन अब चुनावों का समय निकट आने के साथ ही शिक्षकों ने पुराने मसले को दोबारा उठा दिया है. उनका कहना है कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों की भौतिक स्थिति सही नहीं है. यहां छात्र और शिक्षक इतना समय नहीं बिता पाते. उन्होंने कहा कि शिक्षकों ने पहले सरकार की सीबीएसई पैटर्न लागू करने की पहल का स्वागत किया था, लेकिन तीन साल में भी सरकार ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ नहीं किया. जिससे ये पैटर्न अखर रहा है.

यहीं नहीं शिक्षकों का कहना है कि सरकार ने केन्द्र के समान स्कूलों में समय वृद्धि तो की लेकिन केन्द्र के शिक्षकों के समान शिक्षकों के भत्ते नहीं बढ़ाए. ना ही बीते तीन साल में इसका फायदा छात्रों को मिल सका. उन्होंने आरटीई के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों का स्कूल समय साढ़े 4 घंटे तय है. लेकिन सरकार के नियमों से छात्रों को परेशानी हो रही है. शिक्षकों का कहना है कि ये एक गैर वित्तीय मांग है. बावजूद इसके सरकार शिक्षकों को अपने साथ नहीं लेना चाहती. जिसका नुकसान उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकते हैं.

प्रदेश में चुनावी आचार संहिता लग चुकी है. शिक्षक बीजेपी सरकार से अभी भी अपेक्षा लगाए बैठे हैं कि सरकार स्कूलों के समय में कटौती कर दे. इसे आचार संहिता के नियमों के दायरे से भी बाहर बताया जा रहा है. ऐसे में देखना होगा कि जहां तमाम कर्मचारी और शिक्षक वर्ग सरकार से नाखुश होकर सरकार के खिलाफ खड़े होने की तैयारी कर रहे हैं . वहां इस एक फैसले को लेकर सरकार शिक्षकों को खुश करती है या नहीं.

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