मानवेन्द्र को गोद में बिठाकर कांग्रेस ने 29 की हनुमान बेनीवाल की रैली के तो ठाठ बांध दिए

जयपुर . राजपूतों को साधने के लिए कांग्रेस ने भाजपा से नाराज मानवेंद्र को बड़े लाड के साथ  अपने घर में शामिल कर लिया है. चुनाव से पहले घटे इस घटनाक्रम से होने वाले राजनीतिक नफा-नुकसान पर सियासतदारों की नजर टिकी है. लेकिन, इस घटनाक्रम का पहला फायदा खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल को होता दिखाई दे रहा है. कांग्रेस के भीतर राजपूतों को मिलती तवज्जो के बाद अब तय हो चुका है कि 29 अक्टूबर को जयपुर में हनुमान बेनीवाल की महारैली का रंग चोखा होने वाला है.
राजस्थान में भाजपा-कांग्रेस एक-दूसरे को मात देने के लिए दांव दर दांव चल रहे हैं. वहीं, इन दोनों के सामने तीसरे मोर्चे को खड़ा करने में जुटे हनुमान बेनीवाल ने भी ताल ठोक रखी है. बेनीवाल ने 29 को जयपुर मे महारैली करने का एलान करते हुए सियासी हलचल पहले से ही बढ़ा रखी है. वहीं, अब मानवेंद्र के कांग्रेस में आने के साथ बदलते समीकरण के बीच  जाटों का झुकाव बेनीवाल की तरफ होता दिखाई दे रहा है. बेनीवाल पहले से पश्चिमी राजस्थान के साथ ही शेखावटी में सक्रिय हैं. उनकी इस सक्रियता के बीच मानवेंद्र की कांग्रेस में ताजपोसी के बाद से जाटों की सियासी पारा भी चढ़ने लगा है. इसके पीछे कारण यह है कि जाट नेताओं को अब यह डर भी सताने लगा है कि कांग्रेस के भीतर जो अहमियत अब तक उनकी रही है. वो मानवेंद्र और उनके जरिए राजपूतों को साधने के दौरान कमजोर होगी. इस बात से आशंकित जाट नेता भी अंदरखाने समाज के भीतर सक्रिय होने लगे हैं.  बदलते समीकरण के बीच संकेत मिल रहे हैं कि जाट समाज के लोग 29 अक्टूबर को हनुमान बेनीवाल की सभा में अधिक संख्या में भाग लेकर अपनी ताकत दिखा सकते हैं.
क्योंकि, मानवेंद्र के घटनाक्रम के बीच जाटों ने भी खुद की ताकत प्रदर्शित करने के लिए एकजुटता के संदेश अंदरखाने एक-दूसरे को देना शुरू कर दिया है. वहीं, हनुमान बेनीवाल भी रैली के लिए राजस्थान का दौरा करने के दौरान समाज के  लोगों को एकजुट करने का प्रयास बढ़ा दिया है. वे हर जगह यह संदेश भी देने में जुटे हैं कि जाटों का दोनों राजनीतिक दलों  भाजपा-कांग्रेस ने केवल राजनीतिक इस्तेमाल करते रहे हैं. साथ ही ये सवाल भी खड़ा कर रहे हैं कि अगर कोई भी दल जाटों का सही में हिमायती है तो अब तक इस समाज के किसी को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया.
माना जा रहा है कि बेनीवाल की रैली की भीड़ कांग्रेस के इस कदम के बाद से बढ़ना तय है. वहीं, राजनीति के जानकारों का कहना है कि राजपूतों के साधने के दौरान कांग्रेस के लिए जाटों को अपने पाले में बचाए रखना आसान नहीं है. माना जा रहा है कि खुद के वजूद के कमजोर होने की आहत के साथ ही जाट बिदक सकते हैं. ऐसा होने पर कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. खास तौर पर पश्चिमी राजस्थान में,  क्योंकि, इस क्षेत्र में जाट मतदाता अधिक हैं.