लोक कलाओं का मिनी कुंभ उदयपुर का शिल्पग्राम उत्सव 

-सुनीता माहेश्वरी-
उदयपुर। उदयपुर का शिल्पग्राम उत्सव आज लोक कलाओं के मिनी कुंभ का स्वरूप ले चुका है। धर्म और अध्यात्म का संगम कुंभ भी हर साल नहीं आता, लेकिन उदयपुर का यह लोक कला मिनी कुंभ हर साल दिसम्बर में जुड़ता है। इस कुंभ में बरसने वाले लोक रंगों से सराबोर होने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
आलम यह हो रहा है कि दस दिन के दौरान इस कलाओं के गांव में लाखों लोग पहुंच रहे हैं, इतवार के दिन तो यहां तिल धरने की जगह नहीं बचती। इस गांव तक पहुंचने के लिए फतहसागर झील किनारे होते हुए गुजरना होता है, दस दिन के दौरान झील से गांव तक सिर्फ इसी मेले की गूंज सुनाई देती है। मेले में आने वाले सैलानी अब इस परिसर को और बड़ा करने की जरूरत बताने लगे हैं ताकि भीड़ से बचाव हो और लोग कलाओं को निहार सकें, मन में उतार सकें।
झीलों के शहर की प्रसिद्ध फतहसागर झील से कुछ दूर हवाला गांव में बनाए गए लोक कलाओं के गांव ‘‘शिल्पग्राम’’ में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की ओर से हर साल की तरह इस बार भी 21 दिसम्बर को शिल्पग्राम उत्सव का सुरीला और मनमोहना आगाज हुआ। नगाड़ा वादन और दीप प्रज्वलन के साथ दस दिनों का कला कुंभ कला रसिकों के बीच प्रस्फुटित हुआ।
शिल्पग्राम के मुक्ताकाशी रंगमंच ‘‘कलांगन’’ पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवीन्द्र माहेश्वरी, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे.पी. शर्मा तथा महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति उमा शंकर शर्मा, केन्द्र निदेशक फुरकान खान ने भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित किया तथा बाद में डंडे से नगाड़े की धमक से उत्सव का आगाज किया।
निदेशक फुरकान खान के अनुसार, इस बार उत्सव में देश के विभिन्न राज्यों के 700 लोक कलाकार और 27 राज्य के शिल्पकार शिरकत करेंगे। कुलपति प्रो. जे.पी. शर्मा ने कहा कि यंू तो आप पूरा भारत भ्रमण नहीं कर सकते, लेकिन यहां आकर मिनी भारत के दर्शन कर पाएंगे। उदयपुर के लोग लोक एवं संस्कृति के लिए समर्पित हैं। इस अवसर पर राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह से प्राप्त संदेश का वाचन किया जिसमें उन्हांेने उत्सव के लिये शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए कहा कि लोक उत्सवों से देश की सांस्कृतिक एकता और सद्भावना को सुदृढ़ बनाया जा सकता है। आयोजनों में सक्रिय सहभागिता एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को विश्व में फैलाने में मददगार होगी।
गत दो वर्षों से इस समारोह में लोक कला के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार राजस्थान के लोक कला मर्मज्ञ पद्मभूषण डाॅ. कोमल कोठारी लाइफ टाइम अचीवमेन्ट के नाम से दिया जा रहा है। इस बार यह पुरस्कार दो विभूतियों को संयुक्त रूप से दिया गया। लोककला व लोकनृत्य में जोरावर सिंह दानू भाई जादव और लोक कला में शोध कार्य के लिए डाॅ. महेन्द्र भानावत सम्मानित हुए।
इसी के साथ शुरू हुआ लोक कलाओं के रंगों की होली का दौर। दिन में लोगों ने हस्त शिल्प की महीन कारीगरी को देखा तो सांझ ढलते ही लोक सुरों की सरिता में गोते लगाने का आनंद लिया। एक ओर पारम्परिक व्यंजनों की खुशबू ने सैलानियों को लुभाया तो दूसरी ओर गर्मागर्म मलाईदार दूध, राब, जगळ पर भी खूब भीड़ पड़ी। मक्की की पापड़ियां, ताजा निकलता गन्ने का रस, सामने बनते गुड़ ने भी सैलानियों को ठहरने पर मजबूर किया।
हर शाम को मुक्ताकाशी रंगमंच पर देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए कलाकारों ने अपनी पारम्परिक संस्कृति से दर्शकों को रू-ब-रू कराया। लोक नृत्यों में छिपे शौर्य, मर्म, मोहकता, हंसी, रोमांच जैसे हर रस से दर्शक अभिभूत हुए। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार, विकास आयुक्त हथकरघा, नेशनल वूल बार्ड, नेशनल जूट डेवलपमेन्ट बोर्ड, ट्राइफेड तथा देश के अन्य क्षेत्रीय सांस्कृति केन्द्रों के सहयोग से आयोजित उत्सव में 800 शिल्पकारों व 700 लोक कलाकारों ने भाग लिया।
मराठी लावणी नृत्यांगना रेशमा परितकर व उनकी सखियों ने लावणी में अपनी अदाओं और ठुमकों से दर्शकों को रिझाया। राजस्थान का प्रसिद्ध कालबेलिया नृत्य जहां कार्यक्रम की सुंदर प्रस्तुति रही वहीं गुजरात की वसावा जन जाति का होली नृत्य दर्शकों को खूब पसंद आया।
कर्नाटक का पूजा कुनीथा, आॅडीशा का संबलपुरी, केरल का कावड़ी कड़गम, पश्चिम बंगाल का पुरूलिया छाऊ तथा असम के बिहू नृत्य की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को लोक रसरंग से सराबोर सा कर दिया। आॅडीशा के देवी मंदिरों में किया जाने वाला गोटीपुवा नृत्य दर्शकों के लिये रोमांचकारी प्रस्तुति रही। नन्हे बाल कलाकारों ने आकर्षक संरचनाएं बनाते हुए अपनी दैहिक लोच का बेहतरीन तार तम्य गायन और लयकारी के साथ बनाया। मणिपुर का लाय हरोबा वहां की संकीर्तन परंपरा का वाहक बन सका। हरियाणा का घूमर नृत्य सुंदर प्रस्तुति बन सका जिसमें पुरुषों ने महिलाओं को रिझाने के लिए कई प्रलोभन दिए। बाउल गायन, गुजरात का ढाल तलवार व पश्चिम बंगाल का नटुवा नृत्य उत्कृष्ट प्रस्तुति बना।
दस दिवसीय उत्सव के आखिरी दिन जहां एक ओर शहर उमड़ पड़ा तो पारंपरिक वाद्य यंत्रों की समवेत ध्वनि की अनुगूंज झंकार ने समां बांध दिया।
आखिरी दिन ऐसा लगा मानो पूरा शहर शिल्पग्राम में उमड़ पड़ा और आखिरी दिन शिल्पग्राम में आये लोक कलाकारों और शिल्पकारों की एक झलक पाने के इस साल के अंतिम अवसर को खोना नहीं चाहते। समूचा शिल्पग्राम परिसर में लोगों की भारी भीड़ रही तथा शिल्पग्राम के विभिन्न बाजारों के रास्ते पर लोगों को धीरे धीरे सम्भल कर चलना पड़ा। ‘‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’’ की भावना का विस्तार करने के ध्येय से आयोजित इस उत्सव में लोक कलाकार और शिल्पकारोें ने रंगमंच से अपने वाद्यों की तरंगों और अपनी अलमस्त थिरकन से उदयपुर शहर केा अलविदा कहा।
आखिरी दिन हाट बाजार की रंगत मेला प्रारम्भ होते शुरू हो गई तथा दापहर में समूचे हाट बाजार का आलम ये था कि परिसर में चहुंओर लोग ही लोग नजर आये। हाट बाजार में शयद ही कोई शिल्प क्षेत्र ऐसा रहा हो जहां लोगों ने खरीदारी न की हो। कोई शिल्प उत्पाद हाथ में या थैले में जा रहा था तो भारी सामान को गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में स्वयं शिल्पकार लोगों की मदद करते नजर आए।
हाट बाजार में लोगों की मस्ती का आलम ये था कि कोई सेल्फी ले रहा, कोई भुट्टे चगल रहा तो कोई मक्की की पापड़ी खा रहा था। छोटे बच्चे अपने अभिभावकों की गोद में पूंपाड़ी, तीर कमान लिए दिखे। अंतिम दिन शिल्पग्राम के दोनों द्वारों दर्पण द्वार व मुख्य प्रवेश द्वार पर लोगों की खासी भीड़ रही।
परिसर के अंदर दाखिल होते ही लोगों ने लोक कलाकारों के साथ मस्ती की हंसी ठठ्ठा किया और मेले का आनन्द उठाया। लोक कलाओं में भपंग वादकों, लोक गायकों के गीतों को लोगों ने रूहच से सुना व ठुमके भी लगाये। अंतिम सांझ में रंगमंचीय कार्यक्रम में दर्शक दीर्घा कला रसिकों से खचाखच भरी नजर आई। रंगमंच पर सबसे पहले आंगी गैर की रक्तिम आभा ने राजस्थानी संस्कृति का सलोना रूप दिखाया। इसके बाद मांगणियार लोक गायकों ने अपने गायन की तान छेड़ी।
लोक कलाओं की प्रस्तुति की अंतिम शाम पंजाब के भांगड़ा नर्तकों, गुजरात के सिद्दी धमाल नर्तकों, पुणे की लावणी नृत्यांगनाओं तथा राजस्ाििन की कालबेलिया नृत्यांगनाओं ने जहां अपनी नृत्य प्रस्तुति से शाम का स्मरणीय बनाया वहीं असम की बालाओं ने पेंपा की टेर व गोगाना व ढोलकी की थाप पर अपनी कमर की लोच से दर्शकों पर जादू सा कर दिया।
आखिरी दिन आखिरी प्रस्तुति थी लोक वाद्यों की ‘झंकार’ जिसमें कमायचा, सिन्धी सारंगी, मोरचंग, चैतारा, चिमटा, ढोल, थाली, मटका, पुंग ढोल चोलम, ढफ, नगाड़ा, बांसुरी, तुतारी, नाल, ढोलकी, मुगरवान, ताशा, निसान, नादस्वरम्, तविल, गिड़दा, पम्बई, मुरली, खड़ताल आदि लोक वाद्यों की ध्वनियां समाहित हुईं। कार्यक्रम अधिकारी तनेराज सिंह सोढ़ा द्वारा संकल्पित इस प्रस्तुति में लयकारी का प्रयोग कलात्मक ढंग से किया गया जिसमें नाल, ढोलकी, ढोलक, मुगरवान, नगाड़ा, भपंग की जुगलबंदी व उनकी सवाल जवाब दर्शकों को खूब रास आये।

हंसोड़ों ने लगवाये ठहाके, कश्मीर की वादियों के गीत अरावली में गूंजे

-उत्सव की पांचवीं शाम लोक कलाओं और हास्य का अनूठा मिश्रण देखने को मिला। एक ओर जहां केसर की वादियों के गीत अरावली की उपत्यकाओं में गूजा वहीं हास्य कलाकारों ने दर्शक दीर्घा में हंसी के फव्वारे छुड़वा दिये। शुरूआत लंगा कलाकारों के के गयन से हुई इसके बाद बेड़ा रास कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी। नटुवा और गोटीपुवा की जोश व करिश्मों से भरपूर प्रस्तुतियों ने दर्शकों में रोमांच सा भर दिया वहीं कश्मीर की वादियों से आये ‘‘रौफ’’ नृत्य में ‘‘भुम्बरो भुम्बरों गीत’’ की मधुर सवर लहरियों पर कश्मीरी बालाओं ने अपने राज्य में मनाये जाने वाले उत्सवों में खुशी मनाते हुए किया जाता है। कार्यक्रम में हास्य कलाकारों के कार्यक्रम दर्शकों को खूब रास आये। जयपुर के कलाकार सौरभ भट्ट व उनके साथियों ने नाटिका ‘‘भोपाल की ट्रेन’’ में दर्शकों को भरपूर हंसाया। वहीं अहमदाबाद के मिमिक्री कलाकार हेमंत खरसाणी उर्फ चीका भाई ने अपनी मिमिक्री में श्वानों की मीटिंग को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।
कार्यक्रम में महाराष्ट्र का रोप मल्लखम्भ दर्शकों के लिये रोमांचकारी प्रस्तुति रही जिसमें काष्ठ स्तम्भ पर कलाकारों ने विभिन्न प्रकार के योग प्रदर्शन के साथ-साथ दैहिक भंगिमाओं का प्रदर्शन श्रेष्ठ ढंग से किया। गोवा के कलाकारों ने देखणी नृत्य में अपनी अनूठी परंपरा को दर्शाया जिसमें महिलाएं नाविक से नदी पार करवाने का अनुनय करती है और इसके लिये वे उसे कई प्रकार के प्रलोभन व इनाम देने का वादा करती है। ‘‘हंव साहेबा फळतड़ी वेईता…’’ गीत की धुन ने बाॅबी फिल्म की लोकप्रिय धुन की याद दिला दी।
कार्यक्रम में इसके अलावा झारखण्ड का पाईका नृत्य, छत्तीसगढ़ का गौंड मारिया, राजस्थान का सहरिया स्वांग, मध्यप्रदेश का बधाई नृत्य व गुजरात का राठवा नृत्य उल्लेखनीय प्रस्तुतियां रहीं।

नवाचार भी हुए

-शिल्पग्राम के उद्घाटन अवसर पर शिल्पग्राम के मुक्ताकाशी रंगमंच पर ‘‘फ्यूज’’ में लोक गायकी के साथ शास्त्रीय और वाद्य यंत्रों का युग्म उत्कृष्ट ढंग से देखने को मिला। राजस्थान की गायक जाति लंगा मांगणियार द्वारा गाये जाने वाले गीतों को लोक, शास्त्रीय पुट के साथ बखूबी से पेश किया गया। डाॅ. प्रेम भण्डारी द्वारा परिकल्पित इस रचना में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ आधुनिक वाद्य यंत्र आक्टोपेड आदि का फ्यूजन श्रवणीय बन सका वहीं लोक और शास्त्रीय गायकों ने उत्कृष्ट सामंजस्य के साथ राजस्थानी लोक गीतों पर सुर साधे।